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॥ सरस्वती स्तोत्रम् ॥ Saraswati Stotram- English Translation and Meaning with Sanskrit Lyrics
॥ सरस्वती स्तोत्रम् ॥ रवि रुद्र पितामह विष्णु नुतं, हरि चन्दन कुंकुम पंक युतम्। मुनि वृन्द गजेन्द्र समान युतं, तव नौमि सरस्वति! पाद युगम्॥ (Ravi rudra pitaamah vishnu nutam, hari chandan kunkum pank yutam) (Muni vrind gajendra samaan yutam, tava naumi Saraswati! paad yugam) अर्थ: मैं सरस्वती के उन पवित्र चरणों को नमन करता हूँ, जिनकी पूजा सूर्य, रुद्र, ब्रह्मा और विष्णु करते हैं। उनके चरण चंदन और कुंकुम के लेप से सुशोभित हैं और मुनियों के समूह व गजेंद्रों के समान बलशाली ज

संस्कृत का उदय
22 जन॰3 मिनट पठन


आत्मा (Ātman) ?
आत्मा जीव का शाश्वत, अपरिवर्तनीय, चेतन स्वरूप। न जन्म, न मृत्यु—सदैव विद्यमान। ब्रह्मन् (Brahman) सर्वव्यापी, अनन्त, निराकार, परम सत्य। उपनिषदों में “नेति-नेति” द्वारा वर्णित। जीव (Jīva) शरीर में स्थित चेतना जिसने कर्म के अनुसार जन्म-मृत्यु रूप अनुभव किए हैं। जन्म (Birth) कर्म-संचित वासना के कारण जीव का किसी शरीर में प्रवेश। मृत्यु (Death) स्थूल शरीर से आत्मा का पृथक्करण; एक अवस्था का अंत, दूसरी की शुरुआत। कर्म (Karma) आचरण व विचारों का सूक्ष्म लेखा-जोखा, जो भविष्य के सुख

संस्कृत का उदय
21 जन॰1 मिनट पठन


गुरुकुल परम्परा
अनवरत चलने वाली प्राचीन जो किसी न किसी रूप में सदैव चलती रहेगी।

संस्कृत का उदय
21 जन॰1 मिनट पठन


नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने रस की व्याख्या करते हुये कहा है l
#नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने रस की व्याख्या करते हुये कहा है l विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्ररस निष्पत्ति:। विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। सुप्रसिद्ध साहित्य दर्पण में कहा गया है हृदय का स्थायी भाव, जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग प्राप्त कर लेता है तो रस रूप में निष्पन्न हो जाता है। रीतिकाल के प्रमुख कवि देव ने रस की परिभाषा इन शब्दों में की है : जो विभाव अनुभाव अरू, विभचारिणु करि होई। थिति की पूरन वासना, सुकवि कहत रस होई॥ इस प्रकार र

संस्कृत का उदय
21 जन॰2 मिनट पठन


संस्कृत भाषा समाप्त हो जाएगी
लोग कहते है, संस्कृत भाषा समाप्त हो जाएगी लेकिन ये असंभव है। क्योंकि वेद और उपनिषद मंत्र रूप में है, और मंत्र जो स्वयं ब्रह्म है, और ब्रह्म अनादि अनंत है, जिसको कोई समाप्त नहीं कर सकता है। चाहे वो किसी रूप में रहे है। वह किसी भी काल, दिशा, स्थान, और किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलता। वह सबके लिए एकसमान है।

संस्कृत का उदय
21 जन॰1 मिनट पठन


Exploring the Depths of स तरति स तरति and its Influence on लोकान्स्तरयति
1.भगवान वेदव्यास रचित महान ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण जिसका रसास्वादन जनता द्वापरयुग के अंत से आज तक कर रही है। जिसमें सृष्टि के रहस्य को बड़े ही मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया है। इसमें भगवान श्री कृष्ण की लीला और जिस विषय को बड़े बड़े महान बुद्धिमान आज भी समझ नहीं पाते। उस जीवन के सार का बड़े ही सहजता से समझाया है। वह सचमुच इस माया को पार कर जाता है, तथा संसार को भी इससे पार ले जाता है। अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्। प्रेम-स्वरूपम् प्रेम की आंतरिक प्रकृति। भक्ति की अंतर्निहित प्रकृ

संस्कृत का उदय
20 जन॰2 मिनट पठन


स्वयं को समझने और ब्रह्माण्ड को जानने के लिए 15 प्रश्न
स्वयं को समझने और ब्रह्माण्ड को जानने के लिए 15 प्रश्न 1. मैं वास्तव में कौन हूँ—शरीर, मन, बुद्धि या उससे भी परे कुछ? 2. मेरी वर्तमान परिस्थितियाँ किन पिछले कर्मों का परिणाम हो सकती हैं? 3. क्या मेरे जीवन का कोई गहरा उद्देश्य है—जिसे मैं अभी तक पहचान नहीं पाया? 4. मैं कौन-से कर्म रोज़ करता हूँ जो मुझे मोक्ष या शांति की ओर ले जाते हैं? 5. मेरे भीतर की कौन-सी इच्छाएँ मुझे बार–बार जन्म के बंधन में बाँधती हैं? 6. क्या मैं अपने मन (विचारों) को नियंत्रित करता हूँ, या मन मुझे नियंत्

संस्कृत का उदय
20 जन॰7 मिनट पठन


दर्शन: आत्मज्ञान का मार्ग
प्रस्तावना दर्शन (Darshan) केवल आँखों से देखना नहीं, बल्कि गहरे आत्मबोध और सत्य को समझने की प्रक्रिया है। यह आत्मा, ब्रह्मांड और परम सत्य के रहस्यों को उजागर करने का साधन है। यह पुस्तक दर्शन के विभिन्न स्वरूपों को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिससे हर कोई इसका लाभ उठा सके। अध्याय 1: दर्शन की परिभाषा संस्कृत में "दर्शन" शब्द "दृश्" धातु से बना है, जिसका अर्थ "देखना" होता है। परंतु दर्शन केवल इंद्रियों से देखने तक सीमित नहीं, बल्कि यह विचारों, तर्क और ज्ञान की प्रक्रिया से गह

संस्कृत का उदय
19 जन॰5 मिनट पठन


“शिक्षा और सोच –
“शिक्षा और सोच – भूमिका शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं है, बल्कि यह सोचने, समझने और अपने अस्तित्व को पहचानने की यात्रा है। इस किताब में हम उन विचारों, भावनाओं और सवालों को समेटेंगे जो उच्च शिक्षा के छात्र अक्सर महसूस करते हैं। यह आपकी आंतरिक दुनिया की झलक है। 1: मेरी पहचान और उद्देश्य मैं कौन हूँ? मेरी शिक्षा का उद्देश्य क्या है? मैं क्यों पढ़ रहा/रही हूँ? छात्रों की सोच: “मैं अपने भविष्य के लिए पढ़ाई करता हूँ, पर कभी-कभी सोचता हूँ कि मैं क्या हासिल करना चाहता हूँ। क्या मेरी

संस्कृत का उदय
19 जन॰4 मिनट पठन


पुराण – Puran
पुराण — Puran 1.पुराणपरिचयः पुराणों का परिचय और महत्व। पुराणों के प्रकार, उप-पुराण, परंपरागत ज्ञान एवं परंपरा। 2. पुराणिक्षणम् (Purāṇakṣaṇaṃ) पुराणों की शिक्षा का आधार। पुराणों में वर्णित संस्कृति, धर्म और जीवन मूल्यों का अध्ययन। पुराण विषय – पुराण : परिभाषा श्लोक सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ अर्थ (हिंदी): जिस ग्रंथ में सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित — ये पाँच लक्षण हों, वह पुराण कहलाता है। पुराणों के पंचलक्षण स

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19 जन॰1 मिनट पठन


धार्मिक अरणी प्रक्रिया और उसका महत्व
प्राचीन भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता और परंपराओं का गहरा स्थान है। इन परंपराओं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक प्रक्रिया है धार्मिक अरणी प्रक्रिया। यह न केवल एक विधि है, बल्कि यह हमारे जीवन में शांति, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। आज मैं आपसे इस प्रक्रिया के बारे में विस्तार से साझा करना चाहता हूँ, ताकि हम सब मिलकर इस प्राचीन ज्ञान को समझ सकें और अपने जीवन में इसका महत्व जान सकें। धार्मिक अरणी प्रक्रिया क्या है? धार्मिक अरणी प्रक्रिया एक प्र

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19 जन॰4 मिनट पठन


दर्शन: आत्मज्ञान का मार्ग -Dr.Upendar
दर्शन: आत्मज्ञान का मार्ग प्रस्तावना दर्शन (Darshan) केवल आँखों से देखना नहीं, बल्कि गहरे आत्मबोध और सत्य को समझने की प्रक्रिया है। यह आत्मा, ब्रह्मांड और परम सत्य के रहस्यों को उजागर करने का साधन है। यह पुस्तक दर्शन के विभिन्न स्वरूपों को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है, जिससे हर कोई इसका लाभ उठा सके। अध्याय 1: दर्शन की परिभाषा संस्कृत में "दर्शन" शब्द "दृश्" धातु से बना है, जिसका अर्थ "देखना" होता है। परंतु दर्शन केवल इंद्रियों से देखने तक सीमित नहीं, बल्कि यह विचारों, तर्क औ

संस्कृत का उदय
25 दिस॰ 20254 मिनट पठन


नमो नमः
नमो नमः एक भारत, महान भारत, अनेक परंपराएँ। एक भारत — श्रेष्ठ भारत,विविध परंपराओं से सुसज्जित भारत। एक भारत - उदात्त भारत,अनेक परंपराओं का संगम।

संस्कृत का उदय
25 दिस॰ 20251 मिनट पठन


कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत
कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत कौटिल्य (चाणक्य) को भारतीय राजनीतिक चिन्तन का जनक माना जाता है। उन्होंने विश्व-प्रसिद्ध ग्रन्थ “अर्थशास्त्र” की रचना की। उनकी शिक्षा-दीक्षा तक्षशिला विश्वविद्यालय में हुई तथा वे वहाँ आचार्य भी रहे। नन्द राजा द्वारा अपमानित किए जाने पर उन्होंने नन्द वंश के नाश की प्रतिज्ञा ली और चन्द्रगुप्त मौर्य को प्रशिक्षित कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना कराई। कौटिल्य ने सर्वप्रथम व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक राज्य व्यवस्था का सिद्धांत दिया, जिसे सप्तांग सिद्धांत

संस्कृत का उदय
25 दिस॰ 20252 मिनट पठन


पुराण साहित्य में विज्ञान-
पुराण साहित्य को प्रायः केवल धार्मिक एवं पौराणिक कथाओं तक सीमित मान लिया जाता है, जबकि वस्तुतः यह भारतीय ज्ञान–परंपरा का एक बहुआयामी, वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक भंडार है। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य पुराण साहित्य में निहित विविध विज्ञानों—जैसे आयुर्विज्ञान (आयुर्वेद), रत्न विज्ञान, वास्तु विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, सामुद्रिक विज्ञान, पशु विज्ञान,तथा धनुर्विज्ञान—का अनुसन्धानात्मक सर्वेक्षण प्रस्तुत करना है। अग्निपुराण, गरुड़पुराण, मत्स्यपुराण, नारदपुराण एवं विष्णुधर्मोत्तरपुराण

संस्कृत का उदय
23 दिस॰ 20254 मिनट पठन


निर्गुणमानसपूजा
एक ऐसी पूजा विधि है जिसमें बिना किसी भौतिक वस्तु या सामग्री के, मन ही मन या कल्पना में भगवान की पूजा की जाती है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित निर्गुणमानसपूजा शिष्य उवाच अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि । स्थितेऽद्वितीयभावेऽपि कथं पूजा विधीयते ॥ 1 पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् । स्वच्छस्य पाद्यमर्घ्यं च शुद्धस्याचमनं कुतः ॥ 2 निर्मलस्य कुतः स्नानं वासो विश्वोदरस्य च । अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ॥ 3 निर्लेपस्य कुतो गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य च । निर्विशे

संस्कृत का उदय
21 दिस॰ 20252 मिनट पठन


आदि शंकराचार्य द्वारा रचित काशीपंचकम्
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित काशीपंचकम् मनोनिवृत्ति: परमोपशान्ति: सा तीर्थवर्या मणिकर्णिका च। ज्ञानप्रवाहा विमलादिगंगा सा काशिकाSहं निजबोधरूपा।।1 यस्यामिदं कल्पितमिन्द्रजालं चराचरं भाति मनोविलासम्। सच्चित्सुखैका परमात्मरूपा सा काशिकाSहं निजबोधरूपा।।2 कोशेषु पञ्चस्वधिराजमाना बुद्धिर्भवानी प्रतिदेहगेहम्। साक्षी शिव: सर्वगतोSन्तरात्मा सा काशिकाSहं निजबोधरूपा।।3 काश्या हि काशते काशी काशी सर्वप्रकाशिका। सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता हि काशिका।।4 काशीक्षेत्रं शरीरं त्रिभुवनजननी व्

संस्कृत का उदय
21 दिस॰ 20251 मिनट पठन


आदि शंकराचार्य द्वारा रचित सुवर्णमालास्तुति
सुवर्णमालास्तुति अथ कथमपि मद्रासनां त्वद्गुणलेशैर्विशोधयामि विभो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ 1 ॥ आखण्डलमदखण्डनपण्डित तण्डुप्रिय चण्डीश विभो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ 2 ॥ इभचर्माम्बर शम्बररिपुवपुरपहरणोज्ज्वलनयन विभो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ 3 ॥ ईश गिरीश नरेश परेश महेश बिलेशयभूषण भो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम् ॥ 4 ॥ उमया दिव्यसुमङ्गलविग्रहयालिङ्गितवामाङ्ग विभो । साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं

संस्कृत का उदय
21 दिस॰ 20254 मिनट पठन
The Life and Legacy of Adi Shankara: A Journey Through Indian Philosophy
Indian philosophy has been shaped by many great thinkers, but few have left a mark as profound as Adi Shankara. His teachings continue to influence spiritual thought and practice across India and beyond. Understanding his life and work offers insight into the foundations of Advaita Vedanta, a school of philosophy that emphasizes the unity of the self and the ultimate reality. Early Life and Background Adi Shankara was born in the early 8th century in Kalady, a village in pres

संस्कृत का उदय
21 दिस॰ 20253 मिनट पठन
The Legacy of Ramaunjacharya: Exploring His Impact on Philosophy and Culture
Ramaunjacharya stands as a towering figure in the history of Indian philosophy and culture. His teachings and writings have shaped religious thought and cultural practices for centuries. Understanding his legacy offers insight into how his ideas continue to influence spiritual and social life today. Who Was Ramaunjacharya? Ramaunjacharya was a philosopher and theologian who lived in the 11th and 12th centuries. He is best known for founding the Vishishtadvaita school of Vedan

संस्कृत का उदय
21 दिस॰ 20253 मिनट पठन
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