पुराण – Puran
- संस्कृत का उदय

- 19 जन॰
- 1 मिनट पठन
पुराण — Puran
1.पुराणपरिचयः
पुराणों का परिचय और महत्व।
पुराणों के प्रकार, उप-पुराण, परंपरागत ज्ञान एवं परंपरा।
2. पुराणिक्षणम् (Purāṇakṣaṇaṃ)
पुराणों की शिक्षा का आधार।
पुराणों में वर्णित संस्कृति, धर्म और जीवन मूल्यों का अध्ययन।

पुराण विषय –
पुराण : परिभाषा
श्लोक
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥
अर्थ (हिंदी): जिस ग्रंथ में सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित — ये पाँच लक्षण हों, वह पुराण कहलाता है।
पुराणों के पंचलक्षण
सर्ग – सृष्टि की उत्पत्ति
प्रतिसर्ग – प्रलय के बाद पुनः सृष्टि
वंश – देव, ऋषि एवं राजाओं की वंशावलियाँ
मन्वंतर – चौदह मनुओं का विवरण
वंशानुचरित – प्रमुख राजाओं का चरित
महापुराणों के नाम (18)
ब्रह्म
पद्म
विष्णु
शिव (वायु)
भागवत
नारद
मार्कण्डेय
अग्नि
भविष्य
ब्रह्मवैवर्त
लिङ्ग
वराह
स्कन्द
वामन
कूर्म
मत्स्य
गरुड़
ब्रह्माण्ड
उपपुराण (संक्षेप)
महापुराणों के पूरक ग्रंथ उपपुराण कहलाते हैं, जैसे— नारसिंह, कालिका, शिवधर्म, दुर्गापुराण आदि।
पुराणों की आधुनिक प्रासंगिकता
नैतिक शिक्षा
सांस्कृतिक संरक्षण
पर्यावरण चेतना
सामाजिक समरसता



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