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वाल्मिकी जी ने रामायण जैसा महाकाव्य लिख दिया ।इसमें 24000 हजार श्लोक है। जिसका पहला श्लोक गायत्री मंत्र से शुरू होता है।

वियोगी होगा पहला कवि

आह से उपजा होगा पहला गान

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निकलकर आंखों से चुपचाप

बही होगी कविता अन

जान

पहली कविता तो आह से पैदा हुई होगी।

और कविता में रसों का होना अनिवार्य है।

भरत मुनि ने 9 रस बताए है, अपने नाट्यशास्त्र में ।

वाल्मीकि जी ने रामायण में पहला श्लोक अनुष्टुप् छन्द में बोला। जो प्रथम करुण रस में था। 


निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधी: काममोहितम् ।।

अर्थ- 

हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।

घटना दृश्य पर विचार-

मनुष्य जब प्रकृति से तादात्म्य कर संवेदनाओं में एकाकार हो जाता है तब उसका गान कविता बन जाता हैं।


जिसके बाद वाल्मिकी जी ने रामायण जैसा महाकाव्य लिख दिया ।

इसमें 24000 हजार श्लोक है। जिसका पहला श्लोक गायत्री मंत्र से शुरू होता है।

हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर डाला है ।

(शब्दकोश के अनुसार क्रौंच सारस की अथवा बगुला की प्रजाति का पक्षी बताया जाता है। किसी अन्य शब्दकोश में चकवा या चकोर भी देखने को मिला है ।)


 
 
 

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नमो नमः

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