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परंपराया: समर्थनं कुरु, विनाशं वारयितुम् ।। परंपरा को बढ़ावा दें, पतन को रोकें ।

23 फ़र॰
4 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 7 अप्रैल

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ॥

प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः ॥


भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से चली आ रही ‘गुरु-शिष्य परम्परा’ को परम्परा कहते हैं। मां हमारी प्रथम गुरु होती हैं। वह हमें दुनिया से साक्षात्कार करवाती हैं। परम्परा का ज्ञान दादी, दादा और परिवार के अन्य प्रमुख सदस्य कराते हैं।


परम्परा का महत्व


‘परम्परा’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘बिना व्यवधान के शृंखला रूप में जारी रहना’। परम्परा-प्रणाली में किसी विषय या उपविषय का ज्ञान बिना किसी परिवर्तन के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ियों में संचारित होता रहता है। भारतीय संस्कृति विश्व की अत्यन्त प्राचीन और श्रेष्ठ संस्कृति है।


कई सारे युग आए और गए, लेकिन कोई भी इतना प्रभावशाली नहीं हुआ कि वह हमारी वास्तविक संस्कृति को बदल सके। नाभिरज्जु के द्वारा पुरानी पीढ़ी की संस्कृति नई पीढ़ी से आज भी जुड़ी हुई है। हमारी राष्ट्रीय संस्कृति आज भी जीवित है।


आधुनिकता और परम्परा


वर्तमान समय में समाज में जितनी बुराइयां और कमियां आई हैं, उनका मूल कारण है कि हमने अपनी परम्परा को छोड़ दिया है। आज समाज में बच्चे से लेकर युवा, ऐसा कोई भी नहीं है, जो आधुनिकता के प्रभाव में लिप्त न हो!


समाज में हर वह व्यक्ति जो भारतीय परम्परा को नहीं मानता, उसके परिवार के ज्यादातर लोग गलत कार्यों में फंसे होते हैं। संस्कार को ही परम्परा कहते हैं। जो पीढ़ी दर पीढ़ी हर पिता अपने बच्चे को देता है, और फिर वह बच्चा अपने बच्चे को देता है।


अज्ञानता का प्रभाव


परन्तु आज सब कुछ बदल गया है। आज हमारे मुख पर अज्ञानता का पर्दा पड़ा है, और उसी अज्ञानता में पशुत्व की भांति जीवन जीने में मस्त हैं। किसी को भविष्य से कोई मतलब नहीं है! जब व्यक्ति स्वयं अच्छा नहीं होगा, तो वह अपने बच्चे को क्या सिखाएगा? वह भी वही करेगा जो उसके पिता ने किया।


वसुधैव कुटुम्भ की अवधारण को जन्म देने वाला हमारा भारत देश आज अनेक समस्याओं से पीड़ित है। आधुनिक जीवन के मूल्य संकट का प्रमुख कारण यह है कि हमने अच्छे जीवन या सुखी जीवन के विचार को एक छोटे से दायरे में सीमित कर दिया है। केवल पद और पैसा, बस इसी को पाने को लक्ष्य मानना मूल कारण है।


जीवन के दो पक्ष


जीवन के दो पक्ष हैं – एक आन्तरिक और एक बाह्य। लेकिन दोनों का विकास जरूरी है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता ने दुनिया को बहुत कुछ सिखाया है। समय के साथ-साथ सब कुछ बदलता है, परन्तु उसमें कुछ बदलाव लाभदायक होते हैं और कुछ नुकसानदायक।


यदि आपने आवश्यक चीजों को छोड़ दिया, तो एक दिन आपकी पहचान मिट जाएगी। इसका दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा। जब आप संस्कृति और सभ्यता की बात करेंगे, तो आपको निश्चित ही रूढ़ीवादी और कट्टरवादी माना जाने लगेगा।


नैतिक मूल्यों का महत्व


एक बात अवश्य जाननी चाहिए कि व्यक्ति की छाप नैतिक मूल्यों की आधारशिला है। आपके बच्चे कल के भविष्य हैं। बच्चे के लिए उसकी माँ प्रथम गुरु हैं। परिवार का वातावरण, समाज और विद्यालय को देखकर-सीखकर बच्चे का विकास होता है।


भौतिकता की चकाचौंध और अंधानुकरण की दौड़ के कारण अनैतिकता को बढ़ावा मिल रहा है। आप लोगों का ज्ञान तो बढ़ रहा है, लेकिन चरित्र और नैतिकता समाप्त हो रही है। आज की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य केवल अपना पेट भरना और धन कमाना है।


सही दिशा में सोचें


आप स्वयं चिंतन करें कि क्या आपके परिवार का वातावरण सही है? क्या आप सही कार्य कर रहे हैं? बच्चे के पैदा होने से पूर्व यह निश्चित कर लें कि बच्चे को क्या पढ़ाना है, कहाँ पढ़ाना है। लेकिन इसका उद्देश्य केवल यही है कि वहां से पढ़कर निकलेगा तो उसे ज्यादा पैसे मिलेंगे, ज्यादा पैकेज मिलेगा।


तो क्या यही जीवन है? आपका लक्ष्य बस इतना ही है? बच्चे की रुचि, उसका मन, उसकी कौशलता से कोई मतलब नहीं है। जब आप केवल पैसे को ध्यान में रखते हैं, तो उसके मानसिक विकास, उसके विचार, उसके नैतिक मूल्य, उनसे उसका कोई मतलब नहीं होगा।


जिम्मेदारियों का अहसास


तो आप ही बताएं, वह बड़ा होकर गलत कार्य करता है। शादी के बाद आपको घर से निकाल देता है। तब आप कहते हैं कि गलत किया! उसमें उसका कोई दोष नहीं है। सब आपका किया धरा है। जब आपने उसे बचपन से यही सिखाया है कि केवल अपना फायदा कैसे हो, पैसा कैसे कमाया जाए, बस यही सिखाया है।


जब उसे ऐसा गलत ज्ञान मिलेगा, तो वह अंत में अपने साथ अपने परिवार और समाज का अहित ही करेगा। यह भारत है; यहाँ भारतीयता पद्धति से चलोगे तभी आपका विकास संभव है। देश, काल, स्थान के अनुसार चलाना आवश्यक है।


बदलाव की आवश्यकता


मूल बात यह है कि परम्परा और आधुनिकता दोनों में ही विचारों और मूल्यों की एक व्यवस्था है। ये दोनों जगह पर भिन्न-भिन्न रूप में हैं। आप सब चाहे तो अपने जीवन में कुछ बदलाव के द्वारा भारतीय संस्कृति को बचा सकते हैं।


  1. भाषा – का प्रयोग

  2. विद्यालय – गुरुकुल शिक्षा पद्धति के अनुसार नियम

  3. वेशभूषा – का प्रयोग

  4. भोजन – का प्रयोग

  5. भारतीय संगीत – का प्रयोग

  6. लोक ज्ञान (आचार-विचार) – प्रयोग

  7. भारतीय ग्रन्थ – का प्रयोग


ऐसे बहुत सारे बिंदु हैं जिनको अगर हमने बदल लिया, तो अत्यधिक परिवर्तन आ सकता है!


संस्कृति का संरक्षण


अंत में, यही निवेदन है कि आओ सब मिलकर अपनी संस्कृति और विरासतों को भावी पीढ़ी तक पहुँचाते रहें। और परंपरा को बढ़ावा दें, पतन को रोकें। चिंतन अवश्य करें —–


धन्यवाद!

धर्मेन्द्र दुबे

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नमो नमः

एक भारत, नेक भारत, अनेक परंपराएं

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