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डॉ. उपेंद्र दुबे — भारतीय दर्शन ग्रंथों एवं संस्कृत और संस्कृति के संवाहक

डॉ. उपेंद्र दुबे (Dr. Upendar Dubey) भारतीय संस्कृति, संस्कृत भाषा एवं दर्शन शास्त्र के प्रखर प्रचारक हैं। सन् 2017 से उन्होंने भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत के प्रसार के लिए अनेक उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। उनका लक्ष्य रहा है कि संस्कृत केवल विद्यालयों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के हर वर्ग तक जीवन-मूल्य और ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में पहुँचे।

संस्कृत भाषा के प्रचार में योगदान

डॉ. दुबे ने पिछले कई वर्षों में हजारों लोगों को संस्कृत सीखने के लिए प्रेरित किया है। उन्होंने संस्कृत भाषा को सरल और रुचिकर बनाने के लिए अनेक शिक्षण कार्यशालाएँ में आयोजित कीं।

इन कार्यशालाओं के माध्यम से वे लोगों को यह समझाने में सफल रहे कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि जीवन का विचार-तत्व और संस्कारों का आधार है।

भारतीय उत्थान हेतु कार्य​

भारत की भाषाओं और संस्कृति के उत्थान के लिए डॉ. उपेंद्र दुबे ने विभिन्न माध्यमों से अभियान चलाए।
उन्होंने विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, गुरुकुलों और सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से अनेक जनजागरण कार्यक्रम किए। उनके प्रयासों से नवयुवकों में संस्कृत के प्रति रुचि जगी और वे भारतीय विचार धारा को नए दृष्टिकोण से देखने लगे।

दर्शन-ग्रंथों का सरलीकरण

डॉ. दुबे का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने जटिल दर्शन ग्रंथों को जनसामान्य के लिए सरल रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने वेदान्त, सांख्य, योग और पुराणों के गूढ़ सिद्धान्तों को आधुनिक भाषा में समझाने का कार्य किया। इससे साधारण जन भी भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल तत्वों को समझ पाए।

 

डॉ. उपेंद्र दुबे के कार्य और उनका जीवन दोनों ही समर्पण के उदाहरण हैं।
उन्होंने अपने शोध, शिक्षण और समाजसेवा के माध्यम से संस्कृत के पुनर्जागरण की जो लहर उठाई है, वह भविष्य की पीढ़ियों को भारत की आत्मिक परंपरा से जोड़ने का सशक्त साधन बनेगी।

डॉ. उपेंद्र दुबे ने 2017 से अब तक संस्कृत के माध्यम से भारतीय संस्कृति के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी प्रेरणा, शिक्षा एवं सेवा-भावना ने सैकड़ों विद्यार्थियों को नया दिशा दी है। वह सच्चे अर्थों में संस्कृत संवर्धक और भारतीय दर्शन के प्रखर प्रवक्ता हैं।

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गुरुकुल में आचार्यों ने आज भी प्राचीन वैदिक शिक्षा पद्धति को बनाए रखा है।
हम सभी आप सबके इस महान कार्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। और उन परिवार को भी धन्यवाद देते है। जिन्होंने अर्थ और पैसे को सबसे ज्यादा महत्व न देकर अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए अपने पुत्रों को अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया । और वह बड़े ही सौम्य भाव से इस शिक्षा को बनाए रखने में तन मन से लगे हुए है।

जयतु संस्कृतम्।

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WELCOME
Gurukul

सा विद्या या विमुक्तये।
विद्या वही जो बंधनों से मुक्ति दिलाए।

“संस्कृत-भाषा सम्मान 

​संस्कृत भाषा एवं साहित्य के प्रचार-प्रसार, लेखन, काव्य, शोध, साहित्यकार, कवि, लेखक आदि में उत्कृष्ट योगदान देने
लिए-

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सबसे बड़ा दान-
सनातन धर्म में अन्न को 'ब्रह्म' भी कहा गया है और अन्नदान को सबसे बड़ा दान माना गया है
दान का अर्थ है किसी को सहायता या सहयोग प्रदान करना, चाहे वह धन, समय, या संसाधनों के रूप में हो। विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में दान का महत्व है। यहाँ कुछ प्रकार के दान और उनके महत्व पर चर्चा की गई है:

दान के प्रकार
धन दान: यह सबसे सामान्य प्रकार का दान है, जिसमें लोग अपने धन का कुछ हिस्सा जरूरतमंदों को देते हैं।

समय दान: इसमें लोग अपनी सेवाएँ या समय जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं, जैसे कि स्वयंसेवी कार्य।

संसाधन दान: इसमें वस्तुएं, जैसे कपड़े, भोजन, या किताबें दान की जाती हैं।
दान का महत्व
समाज में सहयोग और एकता को बढ़ावा देता है।
जरूरतमंदों की सहायता करता है और उनके जीवन को सुधारता है।
दान करने से व्यक्ति को मानसिक संतोष मिलता है।

दान कैसे करें
अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान की योजना बनाएं।
विश्वसनीय संगठनों या व्यक्तियों को चुनें जिनकी मदद करना चाहते हैं।
दान देने के बाद अपने अनुभव को साझा करें ताकि और लोग भी प्रेरित हों।
दान केवल एक कार्य नहीं है, बल्कि यह एक सोच और दृष्टिकोण है जो समाज को बेहतर बनाता है।

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वाल्मिकी जी ने रामायण जैसा महाकाव्य लिख दिया ।इसमें 24000 हजार श्लोक है। जिसका पहला श्लोक गायत्री मंत्र से शुरू होता है।

वियोगी होगा पहला कवि

आह से उपजा होगा पहला गान

निकलकर आंखों से चुपचाप

बही होगी कविता अनजान

पहली कविता तो आह से पैदा हुई होगी।

और कविता में रसों का होना अनिवार्य है।

भरत मुनि ने 8 रस बताए है, अपने नाट्यशास्त्र में ।

वाल्मीकि जी ने रामायण में पहला श्लोक अनुष्टुप् छन्द में बोला। जो प्रथम करुण रस में था। 

निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधी: काममोहितम् ।।

अर्थ- हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।

घटना दृश्य पर विचार-मनुष्य जब प्रकृति से तादात्म्य कर संवेदनाओं में एकाकार हो जाता है तब उसका गान कविता बन जाता हैं।

जिसके बाद वाल्मिकी जी ने रामायण जैसा महाकाव्य लिख दिया ।

इसमें 24000 हजार श्लोक है। जिसका पहला श्लोक गायत्री मंत्र से शुरू होता है।

हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर डाला है ।

(शब्दकोश के अनुसार क्रौंच सारस की अथवा बगुला की प्रजाति का पक्षी बताया जाता है। किसी अन्य शब्दकोश में चकवा या चकोर भी देखने को मिला है ।)

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नमो नमः

एक भारत, नेक भारत, अनेक परंपराएं

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