गीता जीधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
- संस्कृत का उदय

- 9 नव॰
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जब व्यक्ति किसी भी मोह दौलत,शोहरत, पद, प्रतिष्ठा मान सम्मान में अंधा हो जाता है। तो उसका भी हाल धृतराष्ट्र की तरह होता है।
गीता जी
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।

यहां मामकाः शब्द यह मोह रूप है, कि जब व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचता है। तो वह अच्छाई और बुराई सब भूल जाता है। वो किसी भी तरह के गलत कार्य करने में लग जाता है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कर्म, अकर्म, और विकर्म की बात बताते है। और कहते है, निष्काम भावना से किया गया कर्म व्यक्ति को उच्च स्थान पर ले जाता है।🙏




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