आत्मा (Ātman) ?
- संस्कृत का उदय

- 21 जन॰
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आत्मा

जीव का शाश्वत, अपरिवर्तनीय, चेतन स्वरूप। न जन्म, न मृत्यु—सदैव विद्यमान।
ब्रह्मन् (Brahman)
सर्वव्यापी, अनन्त, निराकार, परम सत्य। उपनिषदों में “नेति-नेति” द्वारा वर्णित।
जीव (Jīva)
शरीर में स्थित चेतना जिसने कर्म के अनुसार जन्म-मृत्यु रूप अनुभव किए हैं।
जन्म (Birth)
कर्म-संचित वासना के कारण जीव का किसी शरीर में प्रवेश।
मृत्यु (Death)
स्थूल शरीर से आत्मा का पृथक्करण; एक अवस्था का अंत, दूसरी की शुरुआत।
कर्म (Karma)
आचरण व विचारों का सूक्ष्म लेखा-जोखा, जो भविष्य के सुख-दुःख निश्चित करता है।
पुनर्जन्म (Rebirth)
जीव का एक शरीर त्यागकर दूसरे शरीर में जाना; संसार चक्र का निरंतर प्रवाह।
मोक्ष (Moksha)
जन्म–मृत्यु से मुक्ति; आत्मा का ब्रह्मन् में पुनः विलय होना।
अहंकार (Ahamkāra)
“मैं” की भावना जो आत्मा को शरीर/मन से जोड़कर भ्रम पैदा करती है।
बुद्धि (Buddhi)
विवेक, निर्णय-शक्ति; अध्यात्म में चित्त-शुद्धि का अनिवार्य साधन।
मन (Manas)
संवेदनाओं और विचारों का केंद्र; इच्छा, संकल्प और विकल्प का आधार।
प्रकृति (Prakṛti)
संपूर्ण भौतिक संसार, तीन गुणों (सत्व, रजस्, तमस्) से निर्मित।
माया (Māyā)
ब्रह्मन् की शक्ति जो विविधता, नाम-रूप का संसार उत्पन्न करती है।
संसार (Saṃsāra)
जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म का सतत चक्र।
84 लाख योनियाँ
विविध जीव-रूप जिनमें आत्मा अपने कर्मानुसार जन्म लेती है।
उपनिषद (Upaniṣad)
वेदांत दर्शन के आधार-ग्रंथ, जो आत्मा-ब्रह्मन् के रहस्य को प्रकट करते हैं।
वेद (Veda)
मानवता का सबसे प्राचीन ज्ञान-संग्रह, ऋषियों द्वारा श्रुत।
ध्यान (Dhyāna)
एकाग्र, निर्विचार अवस्था जिसमें आत्मा का साक्षात्कार संभव होता है।
योग (Yoga)
मन, बुद्धि, आत्मा का एकत्व; मुक्तिपथ का शास्त्रीय विधान।


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