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आत्मा (Ātman) ?

आत्मा


जीव का शाश्वत, अपरिवर्तनीय, चेतन स्वरूप। न जन्म, न मृत्यु—सदैव विद्यमान।


 ब्रह्मन् (Brahman)


सर्वव्यापी, अनन्त, निराकार, परम सत्य। उपनिषदों में “नेति-नेति” द्वारा वर्णित।


 जीव (Jīva)


शरीर में स्थित चेतना जिसने कर्म के अनुसार जन्म-मृत्यु रूप अनुभव किए हैं।


 जन्म (Birth)


कर्म-संचित वासना के कारण जीव का किसी शरीर में प्रवेश।


 मृत्यु (Death)


स्थूल शरीर से आत्मा का पृथक्करण; एक अवस्था का अंत, दूसरी की शुरुआत।


कर्म (Karma)


आचरण व विचारों का सूक्ष्म लेखा-जोखा, जो भविष्य के सुख-दुःख निश्चित करता है।


 पुनर्जन्म (Rebirth)


जीव का एक शरीर त्यागकर दूसरे शरीर में जाना; संसार चक्र का निरंतर प्रवाह।


 मोक्ष (Moksha)


जन्म–मृत्यु से मुक्ति; आत्मा का ब्रह्मन् में पुनः विलय होना।


 अहंकार (Ahamkāra)


“मैं” की भावना जो आत्मा को शरीर/मन से जोड़कर भ्रम पैदा करती है।


बुद्धि (Buddhi)


विवेक, निर्णय-शक्ति; अध्यात्म में चित्त-शुद्धि का अनिवार्य साधन।


 मन (Manas)


संवेदनाओं और विचारों का केंद्र; इच्छा, संकल्प और विकल्प का आधार।


 प्रकृति (Prakṛti)


संपूर्ण भौतिक संसार, तीन गुणों (सत्व, रजस्, तमस्) से निर्मित।


माया (Māyā)


ब्रह्मन् की शक्ति जो विविधता, नाम-रूप का संसार उत्पन्न करती है।


 संसार (Saṃsāra)


जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म का सतत चक्र।


84 लाख योनियाँ


विविध जीव-रूप जिनमें आत्मा अपने कर्मानुसार जन्म लेती है।


उपनिषद (Upaniṣad)


वेदांत दर्शन के आधार-ग्रंथ, जो आत्मा-ब्रह्मन् के रहस्य को प्रकट करते हैं।


 वेद (Veda)


मानवता का सबसे प्राचीन ज्ञान-संग्रह, ऋषियों द्वारा श्रुत।


ध्यान (Dhyāna)


एकाग्र, निर्विचार अवस्था जिसमें आत्मा का साक्षात्कार संभव होता है।


योग (Yoga)


मन, बुद्धि, आत्मा का एकत्व; मुक्तिपथ का शास्त्रीय विधान।

 
 
 

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नमो नमः

एक भारत, नेक भारत, अनेक परंपराएं

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