नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने रस की व्याख्या करते हुये कहा है l
- संस्कृत का उदय

- 21 जन॰
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#नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने रस की व्याख्या करते हुये कहा है l

विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्ररस निष्पत्ति:।
विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। सुप्रसिद्ध साहित्य दर्पण में कहा गया है हृदय का स्थायी भाव, जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग प्राप्त कर लेता है तो रस रूप में निष्पन्न हो जाता है।
रीतिकाल के प्रमुख कवि देव ने रस की परिभाषा इन शब्दों में की है :
जो विभाव अनुभाव अरू, विभचारिणु करि होई।
थिति की पूरन वासना, सुकवि कहत रस होई॥
इस प्रकार रस के चार अंग हैं - स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव।
स्थायी भाव
भाव का अर्थ है:-होना
सहृदय के अंत:करण में जो मनोविकार, वासना या संस्कार रूप में सदा विद्यमान रहते हैं तथा जिन्हें कोई भी विरोधी या अविरोधी दबा नहीं सकता हूं , उन्हें स्थायी भाव कहते हैं।
इनकी संख्या 11 है - रति, हास, शोक, उत्साह, क्रोध, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद, वात्सलता और ईश्वर विषयक प्रेम।
विभाव
विभाव का अर्थ है कारण। स्थायी भाव के उत्पन्न होने के कारणों को विभाव कहते हैं । ये स्थायी भावों का विभावन/उद्बोधन करते हैं, उन्हें आस्वाद योग्य बनाते हैं। ये रस की उत्पत्ति में आधारभूत माने जाते हैं।
विभाव के दो भेद हैं: आलंबन विभाव और उद्दीपन विभाव।
आलंबन विभाव
जिन पात्रों के द्वारा रस निष्पत्ति सम्भव होती है वें आलंबन विभाव कहलाते हैं। जैसे:- नायक और नायिका।
आलंबन के दो भेद होते हैं:आश्रय और विषय
जिसमें किसी के प्रति भाव जागृत होते है।
उद्दीपन विभाव
विषय द्वारा कियें क्रियाएं और वह स्थान जो रस निष्पत्ति में सहायक होते है उन्हें उद्दीपन विभाव कहते हैं।
अनुभाव
रति, हास, शोक आदि स्थायी भावों को प्रकाशित या व्यक्त करने वाली आश्रय की चेष्टाएं अनुभाव कहलाती हैं।
अनुभाव के दो भेद हैं - इच्छित और अनिच्छित।
आलंबन एवं उद्दीपन के माध्यम से अपने-अपने कारणों द्वारा उत्पन्न, भावों को बाहर प्रकाशित करने वाली सामान्य लोक में जो कार्य चेष्टाएं होती हैं, वे ही काव्य नाटक आदि में निबद्ध अनुभाव कहलाती हैं।
साधारण अनुभाव : अर्थात् (इच्छित अभिनय) के चार भेद हैं। 1.आंगिक 2.वाचिक 3. आहार्य 4. सात्विक। आश्रय की शरीर संबंधी चेष्टाएं आंगिक या कायिक अनुभाव है। रति भाव के जाग्रत होने पर भू-विक्षेप, कटाक्ष आदि प्रयत्न पूर्वक किये गये वाग्व्यापार वाचिक अनुभाव हैं। आरोपित या कृत्रिम वेष-रचना आहार्य अनुभाव है।
सात्विक अनुभाव : अर्थात (अनिच्छित) आठ भेद हैं - स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु (कम्प), वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय।
संचारी या व्यभिचारी भाव
जो भाव केवल थोड़ी देर के लिए स्थायी भाव को पुष्ट करने के निमित्त सहायक रूप में आते हैं और तुरंत लुप्त हो जाते हैं, वे संचारी भाव हैं।
संचारी शब्द का अर्थ है, साथ-साथ चलना अर्थात संचरणशील होना, संचारी भाव स्थायी भाव के साथ संचरित होते हैं,
संचारी या व्यभिचारी भावों की संख्या ३३ मानी गयी है - निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, दीनता, चिंता, मोह, स्मृति, धृति, व्रीड़ा, चापल्य, हर्ष, आवेग, जड़ता, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार (मिर्गी), स्वप्न, प्रबोध, अमर्ष (असहनशीलता), अवहित्था (भाव का छिपाना), उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, त्रास और वितर्क।


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