Exploring the Depths of स तरति स तरति and its Influence on लोकान्स्तरयति
- संस्कृत का उदय

- 20 जन॰
- 2 मिनट पठन
1.भगवान वेदव्यास रचित महान ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण जिसका रसास्वादन जनता द्वापरयुग के अंत से आज तक कर रही है। जिसमें सृष्टि के रहस्य को बड़े ही मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया है। इसमें भगवान श्री कृष्ण की लीला और जिस विषय को बड़े बड़े महान बुद्धिमान आज भी समझ नहीं पाते। उस जीवन के सार का बड़े ही सहजता से समझाया है।
वह सचमुच इस माया को पार कर जाता है, तथा संसार को भी इससे पार ले जाता है।
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्।
प्रेम-स्वरूपम् प्रेम की आंतरिक प्रकृति।
भक्ति की अंतर्निहित प्रकृति का सटीक विश्लेषण, परिभाषा या वर्णन करना कठिन है।
मूकास्वादनवत्।
भक्ति का स्वाद इतना ज्यादा है। कि वो बता पाना असम्भव है। जिस प्रकार गूंगा व्यक्ति किसी मीठी चीज को खाकर बता नही सकता । उसी प्रकार भगवान की भक्ति है।
2.जब व्यक्ति किसी भी मोह दौलत,शोहरत, पद, प्रतिष्ठा मान सम्मान में अंधा हो जाता है। तो उसका भी हाल धृतराष्ट्र की तरह होता है।
श्रीमद्भगवत गीता जी
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।
यहां मामकाः शब्द यह मोह रूप है, कि जब व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचता है। तो वह अच्छाई और बुराई सब भूल जाता है। वो किसी भी तरह के गलत कार्य करने में लग जाता है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कर्म, अकर्म, और विकर्म की बात बताते है। और कहते है, निष्काम भावना से किया गया कर्म व्यक्ति को उच्च स्थान पर ले जाता है।
3.जिस प्रकार माता और पिता बच्चे के भगवान अर्थात वृक्ष के पहले अंशरूप बीज में होते है। और उनसे ही बच्चों का सारा संसार है।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्'--संसार
में जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम, चर-अचर आदि जो कुछ भी देखने में आता है, बस सब कुछ ईश्वर के अधीन है। इस वास्तविक मूल तत्त्व को जानकर साधक की इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि जहाँ-कहीं जायँ अथवा मन-बुद्धि में संसार की जो कुछ बात याद आये, उन सबको भगवान का ही स्वरूप माने। ऐसा मानने से साधक को भगवान का ही चिन्तन होगा।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदमहर्जुन'--यहाँ भगवान् समस्त विभूतियों का सार बताते हैं कि सबका बीज अर्थात् कारण मैं ही हूँ।
4.एक ऐसा मंत्र जिसके सुनने से मन शांत हो जाता है। क्या आपने सुना है।
हजारों साल पहले आदिशंकर भगवान द्वारा रचित निर्वाण षट्कम आज भी लोगों को मुग्ध करता है। यह हमें जीवन के सार को समझाता है।
इस मंत्र की रचना कैसे हुई।
जब श्री गोविंदपाद ने आदि शंकराचार्य से पूछा था की – आप कौन हैं? तब शंकराचार्य ने इसकी रचना की थी।
निर्वाण षट्कम का मूल भाव वैराग्य है। इसकी ध्वनि हमारे अंतरात्मा में हलचल पैदा कर देती है।
न मे द्वेष-रागौ न मे लोभ-मोहौ
मदे नैव मे नैव मात्सर्य-भाव: ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष:
चिदानंद-रूपं शिवो-हं शिवो-हं ॥
न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह
न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से अलग हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं
न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञा: ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानंद-रूपं शिवो-हं शिवो-हं ॥




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