भोगने में सुख कहां है। जो सोचने में सुख होता है।
- संस्कृत का उदय

- 26 जून
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जिसे तुम देख रहे हो। वो किसी और को देख रहा है। और जो उसे भोग रहा है। वो भी किसी और को देख रहा है। भोगते-भोगते जीवन बीत है। पर सुख नहीं है।
भोगने में सुख कहां है।
जो सोचने में सुख होता है। वो भोगने में नही होता।
और भोगते-भोगते पूरा जीवन निकल जाता है। फिर भी सुख नहीं मिलता।
सुख तो स्वयं के अंदर है। ईश्वर के गुणगान में।
और वो सुख स्वयं के अंदर की अनुभूति है।
सुख की अति से भी व्यक्ति बोर हो जाता है।
अंतोगत्वा सुख क्षणिक है।



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