top of page

भोगने में सुख कहां है। जो सोचने में सुख होता है।

जिसे तुम देख रहे हो। वो किसी और को देख रहा है। और जो उसे भोग रहा है। वो भी किसी और को देख रहा है। भोगते-भोगते जीवन बीत है। पर सुख नहीं है। 


भोगने में सुख कहां है। 


जो सोचने में सुख होता है। वो भोगने में नही होता। 


और भोगते-भोगते पूरा जीवन निकल जाता है। फिर भी सुख नहीं मिलता। 


सुख तो स्वयं के अंदर है। ईश्वर के गुणगान में।


और वो सुख स्वयं के अंदर की अनुभूति है। 


सुख की अति से भी व्यक्ति बोर हो जाता है।


अंतोगत्वा सुख क्षणिक है।

भोगने में सुख कहां है। जो सोचने में सुख होता है।
भोगने में सुख कहां है। जो सोचने में सुख होता है।
 
 
 

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें

नमो नमः

एक भारत, नेक भारत, अनेक परंपराएं

  • YouTube
  • Facebook
  • Whatsapp
  • Instagram
  • Twitter
  • LinkedIn

© 2025 संस्कृत का उदय

bottom of page