भोगने में सुख कहाँ है?
भोगने में सुख कहाँ है?

जिसे तुम देख रहे हो, वह किसी और को देख रहा है। और जिसे तुम भोग रहे हो, वह भी किसी और की ओर देख रहा है।
भोगते-भोगते पूरा जीवन बीत जाता है, फिर भी सच्चा सुख नहीं मिलता।
भोगने में सुख कहाँ है?
जो सुख सोचने, कल्पना करने और प्रतीक्षा करने में मिलता है, वह कई बार भोगने में नहीं मिलता।
इच्छाओं के पीछे भागते-भागते मनुष्य अपना पूरा जीवन बिता देता है, लेकिन तृप्ति फिर भी अधूरी रह जाती है।
सच्चा सुख तो स्वयं के भीतर है, ईश्वर के गुणगान में है और आत्मा की अनुभूति में है।
यह सुख बाहरी वस्तुओं पर नहीं, बल्कि हमारे भीतर की शांति और संतोष पर निर्भर करता है।
और एक बात याद रखिए—सुख की अति भी कभी-कभी व्यक्ति को ऊबा देती है।
इसलिए सुख को केवल भोगने में मत खोजिए, कभी अपने भीतर झाँककर भी देखिए। शायद जिस सुख को आप संसार में खोज रहे हैं, वह आपके भीतर ही छिपा हो।




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