top of page

सप्तसारस्वत तीर्थ कैसे प्रकट हुआ ?

विनशन सरस्वती नदी का नाम है, सप्तसारस्वत तीर्थ का विशेष वृत्तान्त महाभारत के शल्य पर्व में मिलता हैसप्तसारस्वत नामक यह तीर्थ पिहोवा से लगभग 12 कि. मी. तथा कुरुक्षेत्र से लगभग 42 कि. मी. दूरी पर माँगना नामक ग्राम की उत्तरी दिशा में सरस्वती नदी के दक्षिण-पश्चिमी तट पर स्थित है

जब बलदेवजी को बड़ा विस्मय हुआ। वहाँ भी उन्होंने वे सप्तसारस्वत नामक तीर्थमें चले गये; जहाँ वायु, जल, फल अथवा पत्ता खाकर रहनेवाले बहुत से महात्मा थे।

जनमेजयने पूछा- मुनिवर ! सप्तसारस्वत तीर्थ कैसे प्रकट हुआ ?

वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन् सरस्वती नाम से प्रसिद्ध सात नदियाँ हैं, ये सारे जगत् में फैली हुई हैं। इनके विशेष नाम हैं—सुप्रभा, कांचनाक्षी, विशाला, मनोरमा, ओघवती, सुरेणु तथा विमलोदका। शक्तिशाली महात्माओंने भिन्न-भिन्न देशोंमें एक एक सरस्वतीका आवाहन किया है। एक समयकी बात है, पुष्करतीर्थ में ब्रह्माजीका एक महान् यज्ञ हो रहा था, उस समय ऋषियों ने पितामहसे कहा-'यह यज्ञ अधिक गुणोंसे सम्पन्न नहीं दिखायी देता; क्योंकि

अभी तक यहाँ सरिताओं में श्रेष्ठ सरस्वती का ही प्रादुर्भाव नहीं हुआ।' यह सुनकर ब्रह्माजीने सरस्वतीका स्मरण किया। उनके आवाहन करते ही 'सुप्रभा' नामवाली सरस्वती (पुष्कर तीर्थमें प्रकट हो गयी। इसी तरह नैमिषारण्यमें भी वेदके स्वाध्याय में लगे रहनेवाले मुनियोंने सरस्वतीका आवाहन किया उनके चिन्तन करते ही वहाँ 'कांचनाक्षी' नामवाली सरस्वती नदी प्रकट हो गयी। ऐसे ही जब राजा गय यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनके यहाँ भी सरस्वतीका आवाहन किया गया था। वहाँ 'विशाला' नामवाली सरस्वतीका आविर्भाव हुआ। उसकी गति बड़ी तेज है। यह हिमालयकी घाटीसे निकली हुई है। एक समयकी बात है, उत्तर कोसल प्रान्तमें उद्दालक मुनि यज्ञ कर रहे थे, उन्होंने भी सरस्वतीका स्मरण किया। ऋषिके कारण वह नदी उस देशमें भी प्रकट हुई, जिसका मुनियोंने पूजन किया। वह 'मनोरमा' नामसे विख्यात हुई; क्योंकि ऋषियोंने पहले उसका अपने मनमें ही स्मरण किया था। सुरेणु' नामवाली सरस्वती नदीका प्रादुर्भाव ऋषभ द्वीपमें हुआ। जिस समय राजा कुरु कुरुक्षेत्र में यज्ञ कर रहे थे, उसी समय वहाँ सरस्वती प्रकट हुई। गंगाद्वारमें यज्ञ करते समय दक्षप्रजापतिने जब सरस्वतीका स्मरण किया था तो वहाँ भी सुरेणु ही प्रकट हुई। इसी प्रकार महात्मा वसिष्ठजी भी एक बार कुरुक्षेत्रमें यज्ञ कर रहे थे, वहाँपर उन्होंने सरस्वतीका आवाहन किया; उनके आवाहनसे 'ओघवती का प्रादुर्भाव हुआ।

ब्रह्माजीने एक बार हिमालयपर्वतपर भी यज्ञ किया था, वहाँ जब उन्होंने सरस्वतीका स्मरण किया तो 'विमलोदका' प्रकट हुई।

इन सातों सरस्वतियोंका जल जहाँ एकत्र हुआ है, उसे सप्त- सारस्वत कहते हैं। इन्हींसे परम- पवित्र सप्तसारस्वत तीर्थकी प्रसिद्धि हुई है।



टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें

नमो नमः

एक भारत, नेक भारत, अनेक परंपराएं

  • YouTube
  • Facebook
  • Whatsapp
  • Instagram
  • Twitter
  • LinkedIn

© 2025 संस्कृत का उदय

bottom of page