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“श्लोकसंस्कृत्या विद्यालयस्य विकासः” नीलकण्ठः भव: – ज्ञानस्य प्रकाशेन विजयस्व।  एक नीलम बनो – ज्ञान के प्रकाश से विजय प्राप्त करो।

  नीलकण्ठः भव: – ज्ञानस्य प्रकाशेन विजयस्व।  एक नीलम बनो – ज्ञान के प्रकाश से विजय प्राप्त करो।

 

प्रधानाचार्य कक्ष (Principal Room)

श्लोक: विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

अर्थ: विद्या विनम्रता देती है, विनम्रता से योग्यता आती है, योग्यता से धन और धन से धर्म तथा सुख की प्राप्ति होती है।

श्लोक:विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्। अर्थ: विद्या का धन सभी धनों में श्रेष्ठ होता है।

वैकल्पिक: न च विद्यासमो बन्धुः। अर्थ: विद्या जैसा कोई मित्र नहीं।

प्रथम तल (First Floor – कक्षा नर्सरी से 5 तक) श्लोक: सत्यम् वद, धर्मम् चर।

अर्थ: सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो।

श्लोक: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

 अर्थ:तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं।

द्वितीय तल (Second Floor – कक्षा 6 से 8 तक)

श्लोक: विद्या ददाति विनयम्।  अर्थ: विद्या से विनम्रता आती है।

 श्लोक: उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।  अर्थ: परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।

श्लोक: आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।  अर्थ: आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।

  श्लोक: उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।  अर्थ:मनुष्य को अपने आत्मबल से स्वयं को ऊपर उठाना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए।

तृतीय तल (Third Floor – कक्षा 9 से 12 तक)

 श्लोक: सा विद्या या विमुक्तये।  अर्थ: वही सच्ची विद्या है जो मुक्ति प्रदान करे।

श्लोक: यथा चित्तं तथा वाचः, यथा वाचस्तथा क्रिया।  अर्थ: जैसा मन होता है, वैसी ही वाणी और वैसे ही कर्म होते हैं।

शिक्षक कक्ष (Teacher’s Room)  श्लोक: गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।  अर्थ: गुरु स्वयं परब्रह्म स्वरूप हैं, उन श्रीगुरु को नमस्कार है।

श्लोक:आचार्यदेवो भव।  अर्थ: गुरु को देवता के समान मानो।

श्लोक:स्वस्मै स्वल्पं समाजाय सर्वस्वम्।  अर्थ: अपने लिए थोड़ा और समाज के लिए सब कुछ अर्पण करो।

स्टाफ रूम (Staff Room)  श्लोक: सम्यगाचार एव शिक्षायाः मूलम्।  अर्थ: श्रेष्ठ आचरण ही शिक्षा का आधार है।

श्लोक: सहकार्यं सफलतायाः सूत्रम्।  अर्थ: सहयोग ही सफलता का सूत्र है।

खेल मैदान (Play Ground)

श्लोक: क्रीडायां शरीरं स्वास्थ्याय साधनम्।  अर्थ: खेल शरीर के स्वास्थ्य का साधन है।

श्लोक: उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।  अर्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ लक्ष्य प्राप्त करो।

 श्लोक: शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।  अर्थ: शरीर ही धर्म पालन का प्रथम साधन है, अतः इसे स्वस्थ रखना आवश्यक है।

विद्यालय बस (School Bus)

श्लोक: सुरक्षायै सावधानः भव।  अर्थ: सुरक्षा के लिए सदैव सतर्क रहो।

श्लोक: विनयेन शोभते शिक्षार्थी।  अर्थ: विनम्रता से ही विद्यार्थी शोभित होता है।

 रिसेप्शन (Reception Area)

श्लोक: अतिथि देवो भव।  अर्थ: अतिथि देवता के समान हैं।

श्लोक: सत्सङ्गः सुरक्षायै मूलम्।  अर्थ: अच्छी संगति ही सुरक्षा का मूल कारण है।

माता-पिता हेतु (Parents’ Area / Waiting Room)

श्लोक: जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।  अर्थ: माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।

  श्लोक: माता पिता गुरुर्देवाः।  अर्थ: माता, पिता और गुरु – ये ही साक्षात देवता हैं।

विद्यालय प्रवेश द्वार  (Main Gate)

 श्लोक: सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।  अर्थ: सब सुखी हों, सब निरोगी रहें।


 


 
 
 

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