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पुराण का परिचय (Introduction of Purana)

पुराण भारतीय वाङ्मय का अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग हैं।पुराणों के माध्यम से धर्म, दर्शन, नीति, इतिहास, वंशावली और लोकजीवन का संरक्षण किया गया है।

पुराण वे ग्रन्थ हैं जिनमें

  • सृष्टि की उत्पत्ति

  • देव-ऋषि-राजाओं की कथाएँ

  • अवतारों का वर्णन

  • धर्म और कर्म का उपदेश सरल कथा-शैली में मिलता है।

 उद्देश्य – सामान्य जन को धर्म और दर्शन समझाना।

पुराण की परिभाषा (Definition of Purana)

 शास्त्रीय परिभाषा:

पुराणं पञ्चलक्षणम्।

अर्थात् –जिस ग्रन्थ में पाँच लक्षण हों, वही पुराण कहलाता है।

पुराण के लक्षण (पञ्चलक्षण)

 पाँच प्रमुख लक्षण:

1.सर्गः – सृष्टि की प्रथम रचना (महाभूतों की उत्पत्ति)

2️.प्रतिसर्गः – प्रलय के बाद पुनः सृष्टि

3️.वंशः – देवताओं और ऋषियों की वंशावली

4️.मन्वन्तरम् – प्रत्येक मनु का शासन काल और घटनाएँ

5️.वंशानुचरितम् – सूर्यवंश, चन्द्रवंश आदि राजाओं का इतिहास

 इन्हीं पाँच के आधार पर किसी ग्रन्थ को पुराण माना जाता है।


महापुराणों का संक्षिप्त परिचय

महापुराण – 18

क्रम

पुराण

1

ब्रह्म

2

पद्म

3

विष्णु

4

शिव (वायु / लिङ्ग)

5

भागवत

6

नारद

7

मार्कण्डेय

8

अग्नि

9

भविष्य

10

ब्रह्मवैवर्त

11

लिङ्ग

12

वराह

13

स्कन्द

14

वामन

15

कूर्म

16

मत्स्य

17

गरुड़

18

ब्रह्माण्ड

 “महापुराण → 18

 पुराणों की कथा-शैली

 संवादात्मक शैली (ऋषि–शिष्य संवाद)  सरल भाषा  दृष्टान्तों का प्रयोग  कथा के माध्यम से दर्शन

पुराणों का दार्शनिक पक्ष

पुराण केवल कथा नहीं, बल्कि दर्शन का सरल रूप हैं।

प्रमुख दर्शन:

भक्तिकर्मज्ञानवैराग्यमोक्ष

विशेषकर भागवत पुराण में भक्ति-दर्शन अत्यन्त स्पष्ट है।

पुराणों का उद्देश्य (Aim of Puranas)

1️.धर्म की स्थापना 2️.अधर्म का नाश 3️.समाज को नैतिक शिक्षा 4️.इतिहास का संरक्षण 5️.मोक्ष-मार्ग का बोध

 श्लोक 1:

पुराणं पञ्चलक्षणम्।

अर्थ – पुराण पाँच लक्षणों से युक्त होता है।

 श्लोक 2 (भागवत पुराण):

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।

अर्थ –वही धर्म श्रेष्ठ है जो भगवान की कथा की ओर प्रेरित करे।

श्लोक 3:

इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।

अर्थ – इतिहास और पुराणों के द्वारा वेदों को समझना चाहिए।


 
 
 

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नमो नमः

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