इस वेदमन्त्र के अनुसार मुमुक्षु जनों को भी कर्म करना चाहिए।
- संस्कृत का उदय

- 23 जन॰
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कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥

इस वेदमन्त्र के अनुसार मुमुक्षु जनों को भी कर्म करना चाहिए। वेदविहित कर्म करने से कर्मबंधन स्वतः समाप्त हो जाता है - (कर्मणा त्यज्यते ह्यसौ, तस्मान्मुमुक्षुभिः कार्य नित्यं नैमित्तिकं तथा आदि वचनों के अनुसार भारतीय आस्तिक दर्शनों का मुख्य प्राण मीमांसा दर्शन है।


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