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प्रतिदिन पढने वाले श्लोक

प्रातः स्मरण मंत्र

प्रात: हाथ(कर)- दर्शनम्

          कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।

          करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥

अर्थ- हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती तथा मूल में गोविन्द (परमात्मा ) का वास होता है। प्रातः काल में हाथों का दर्शन करें ।

                         

वेदों के प्रसिद्ध मन्त्र (संस्कृत सहित हिन्दी अर्थ सहित)

 

 १. गायत्री मन्त्र (ऋग्वेद ३.६२.१०)

संस्कृत:
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

अर्थ:
हम उस परम तेजस्वी सविता देव का ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे।

२. शान्ति मन्त्र (यजुर्वेद ३६.१७)

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥

अर्थ:
आकाश, पृथ्वी, जल, औषधियाँ, वृक्ष, देवता, ब्रह्म—सबमें शान्ति ही शान्ति हो।

३. त्र्यम्बक मन्त्र (ऋग्वेद ७.५९.१२)

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

अर्थ:
हम त्रिनेत्र शिव की उपासना करते हैं, जो जीवनदाता और पुष्टिदाता हैं; वे हमें मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें।

४. शं नो मित्रः शं वरुणः (ऋग्वेद १.९०.९)

शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥

अर्थ:
मित्र, वरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति, और विष्णु—सभी देवता हमें कल्याण प्रदान करें।

५. आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः (ऋग्वेद १.८९.१)

अर्थ:
सभी दिशाओं से हमारे पास शुभ विचार आएँ।

६. असतो मा सद्गमय (बृहदारण्यक उपनिषद् १.३.२८)

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥

अर्थ:
मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।

७. सर्वे भवन्तु सुखिनः (यजुर्वेद ३६.२२)

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥

अर्थ:
सब लोग सुखी हों, स्वस्थ रहें, सबका कल्याण हो, कोई भी दुखी न हो।

८. ॐ सह नाववतु (तैत्तिरीय उपनिषद्)

ॐ सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु।
सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

अर्थ:
हम दोनों (गुरु-शिष्य) एक साथ सुरक्षित रहें, साथ मिलकर अध्ययन करें, बलवान बनें, और परस्पर द्वेष न करें।

९. पूषा नो यथा वेद (ऋग्वेद १.८९.२)

पूषा नो यथा वेद देवानां भवन्तु नः सखा॥

अर्थ:
हे पूषन देव! जैसे आप देवताओं के मित्र हैं, वैसे ही हमारे भी मित्र बनें।

१०. अग्निमीळे पुरोहितं (ऋग्वेद १.१.१)

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम्॥

अर्थ:
मैं अग्निदेव का पूजन करता हूँ, जो यज्ञ के पुरोहित, देवताओं के यजमान, और वरदानदाता हैं।

११. ऋतं च सत्यं च अभिद्धात् (ऋग्वेद १०.१९०.१)

अर्थ:
सृष्टि की उत्पत्ति ऋत (नियम) और सत्य से हुई है।

१२. इन्द्राय स्वाहा (ऋग्वेद ३.३२.१)

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः।
अर्थ:
इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि — ये सभी एक ही परम सत्य के विभिन्न रूप हैं।

१३. ओषधयः शं नो अस्तु (ऋग्वेद १०.९७)

अर्थ:
हे औषधियो! तुम हमें कल्याण दो, आरोग्य दो, दीर्घायु दो।

१४. हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् (ईशोपनिषद् १५)

अर्थ:
सत्य का मुख एक सुनहरे पात्र से ढका है; हे ईश्वर! उसे हटाकर हमें सत्य के दर्शन कराओ।

१५. यत्र विश्वं भवत्येकनीडम् (अथर्ववेद १९.५३.८)

अर्थ:
जहाँ सारा जगत एक परिवार बन जाता है।

१६. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं (ईशोपनिषद्)

अर्थ:
वह (ईश्वर) पूर्ण है, यह (संसार) भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।

 १७. मातृदेवो भव, पितृदेवो भव (तैत्तिरीय उपनिषद्)

अर्थ:
माता को देवता समान मानो, पिता को देवता समान मानो।

१८. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः (मनुस्मृति)

अर्थ:
जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।

१९. अग्ने नय सुपथा (ऋग्वेद १.१८९.१)

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्।
अर्थ:
हे अग्निदेव! हमें शुभ मार्ग पर ले चलो।

२०. ओ३म् शं नो मित्रः (ऋग्वेद १.९)

अर्थ:
मित्र और वरुण हमें कल्याण दें।

२१. इदं न मम (यजुर्वेद)

अर्थ:
यह (यज्ञ, कर्म, फल) मेरा नहीं — यह सब ईश्वर का है।

२२. ओ३म् अग्नेयं बलं अस्माकं अस्तु (यजुर्वेद)

अर्थ:
हे अग्निदेव! हमारा बल और उत्साह बने रहें।

२३. ॐ आदित्याय नमः (ऋग्वेद)

अर्थ:
सूर्य देव को नमस्कार, जो सबको प्रकाश और जीवन देते हैं।

२४. ॐ सोमाय नमः (ऋग्वेद)

अर्थ:
चन्द्रदेव को नमस्कार, जो शीतलता और शान्ति प्रदान करते हैं।

२५. ॐ वरुणाय नमः (ऋग्वेद)

अर्थ:
जल के देवता वरुण को नमस्कार — जो जीवन का आधार हैं।

২৬. ॐ वायुं प्राणं जीवसे नय (ऋग्वेद)

अर्थ:
हे वायु! हमें प्राण और जीवन दो।

२७. ओ३म् अग्ने यं यज्ञम् अध्वरम् (ऋग्वेद)

अर्थ:
हे अग्निदेव! यज्ञ को सफल बनाओ।

२८. ओ३म् वसुधैव कुटुम्बकम् (महाआरण्यक)

अर्थ:
सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।

२९. ओ३म् शं नो देवीरभिष्टयः (ऋग्वेद १०.९)

अर्थ:
हे देवियो, हमारे जीवन में कल्याण और शुभ फल बरसाओ।

३०. ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः (सर्ववेदान्त)

अर्थ:
तीनों लोकों (शरीर, मन, आत्मा) में शान्ति ही शान्ति रहे।

वेदों के ३० मन्त्र — भाग २

(ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद से, हिन्दी अर्थ सहित)

१. पुरुषसूक्त (ऋग्वेद १०.९०.१)

संस्कृत:
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङुलम्॥

हिन्दी अर्थ:
वह पुरुष (परमात्मा) सहस्र मुख, नेत्र और चरणों वाला है; उसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने में धारण कर रखा है।

२. नमो अस्तु रुद्राय (यजुर्वेद १६.१)

संस्कृत:
नमो अस्तु रुद्रायातताविने च।
अर्थ:
हे रुद्रदेव! आपको बारम्बार नमस्कार, जो समस्त सृष्टि के रक्षक हैं।

३. नमः शम्भवाय च मयोभवाय च (यजुर्वेद १६.४१)

अर्थ:
शम्भु (कल्याणस्वरूप) और मयोभव (आनन्दस्वरूप) शिव को नमस्कार।

४. ईशानः सर्वविद्यानाम् (यजुर्वेद १६.५०)

अर्थ:
शिव ही सभी विद्याओं के स्वामी हैं, सभी जीवों के हृदय में स्थित हैं।

५. अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत् (ऋग्वेद १.५९.१)

अर्थ:
अग्नि स्वर्ग का शिखर है, जो सभी दिशाओं में प्रकाश फैलाता है।

६. उद्भवः करमः (यजुर्वेद ३२.३)

अर्थ:
परमात्मा ही सबका उद्गम और सहायक है।

७. ॐ वयं नामानि महतो अद्यस्य (ऋग्वेद)

अर्थ:
हम उस महान परमात्मा के नामों का ध्यान करते हैं जो सबके भीतर हैं।

८. अपाम नपात् (ऋग्वेद २.३५.३)

अर्थ:
जल में निवास करने वाले अग्नि देव हमें तेजस्विता और पवित्रता दें।

९. शं नो देवीरभिष्टयः (ऋग्वेद १०.९.४)

अर्थ:
हे देवियो! हमें कल्याण और सुख प्रदान करो।

१०. अग्ने तन्मे मनः (ऋग्वेद)

अर्थ:
हे अग्निदेव! मेरा मन शुभ विचारों से युक्त करें।

११. वायुरनिलममृतम् (ईशोपनिषद् १७)

अर्थ:
यह वायु अमर है; शरीर नष्ट होता है पर आत्मा अमर रहती है।

१२. अग्निं दूतो वि वक्षति (ऋग्वेद)

अर्थ:
अग्नि देवताओं तक हमारी वाणी को पहुँचाने वाले दूत हैं।

१३. हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे (ऋग्वेद १०.१२१.१)

अर्थ:
सृष्टि की उत्पत्ति में सबसे पहले हिरण्यगर्भ (ईश्वर) प्रकट हुए।

jp,m१४. एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (ऋग्वेद १.१६४.४0

अर्थ:
सत्य एक ही है, ज्ञानी लोग उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

१५. वयं ते रुद्र प्रचेतसः (ऋग्वेद २.३३.११)

अर्थ:
हे रुद्रदेव! हमें आपके कृपालु स्वरूप का साक्षात्कार हो।

१६. अग्ने यं यज्ञम् अध्वरम् (ऋग्वेद १.१.२)

अर्थ:
हे अग्निदेव! हम जिस यज्ञ का आरंभ कर रहे हैं, उसे सफल बनाइए।

१७. त्वमेव प्रत्यक्षं तत् ब्रह्मासि (तैत्तिरीय आरण्यक)

अर्थ:
हे परमात्मा! आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं।

१८. ओ३म् आदित्यानां वदनं भवति (सामवेद)

अर्थ:
सूर्य देव सभी प्रकाश और ज्ञान के मूल हैं।

१९. अग्ने नय सुपथा (ऋग्वेद १.१८९.१)

अर्थ:
हे अग्निदेव! हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें।

२०. यजमानाय शं योः (सामवेद)

अर्थ:
यज्ञ करने वाले के लिए कल्याण और सुख की प्राप्ति हो।

२१. ब्रह्माणं जनयन्तः (ऋग्वेद)

अर्थ:
विद्या और सत्य के द्वारा ही हम ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करते हैं।

२२. आपो हिष्ठा मयोभुवाः (ऋग्वेद १०.९.१)

अर्थ:
जल ही सबका जीवन है, जो आनंददायी है।

२३. वयं ते सोम प्रजापतिं (ऋग्वेद)

अर्थ:
हे सोमदेव! हमें प्रजावृद्धि और आरोग्य प्रदान करें।

२४. स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः (ऋग्वेद १.८९.६)

अर्थ:
इन्द्र, पूषा, गरुत्मान और बृहस्पति हमें कल्याण दें।

२५. शं नो मित्रः शं वरुणः (ऋग्वेद १.९०.९)

अर्थ:
मित्र और वरुण देवता हमें शान्ति और सुख दें।

२६. नमो भगवते रुद्राय (यजुर्वेद)

अर्थ:
सभी रूपों में विद्यमान रुद्र (शिव) को नमस्कार।

२७. नमस्ते अस्तु भगवन् विश्वेश्वराय (यजुर्वेद)

अर्थ:
हे विश्वेश्वर! आपको नमस्कार — जो ब्रह्माण्ड के अधिपति हैं।

२८. आपो देवाः (अथर्ववेद १९.२)

अर्थ:
हे जलदेवता! हमें पवित्रता और बल प्रदान करें।

२९. शं नो देवीरभिष्टयः (ऋग्वेद १०.९)

अर्थ:

हे देवियो! हमें कल्याण, समृद्धि और आरोग्य दें।

३०. ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः (सर्ववेदान्त)

अर्थ:
शरीर, मन और आत्मा—तीनों स्तरों पर शान्ति बनी रहे।

 

१. रुद्रसूक्त (यजुर्वेद १६.१)

नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे नमः।
अर्थ:
हे रुद्रदेव! आपके कोप और बाण को नमस्कार; आप हमें शान्ति और कृपा दें।

२. नमो अस्त्वायु धाय च (यजुर्वेद १६.३)

अर्थ:
जो प्राणदायी हैं, जो प्राणों के रक्षक हैं, उन्हें नमस्कार।

३. नमः शर्वाय च पशुपतये च (यजुर्वेद १६.२७)

अर्थ:
शर (तीर) धारण करने वाले और पशुपति (सभी प्राणियों के स्वामी) शिव को नमस्कार।

४. ईशानः सर्वविद्यानाम् (यजुर्वेद १६.५०)

अर्थ:
ईश्वर सभी विद्याओं के अधिपति हैं; वे हृदय में स्थित हैं।

५. नारायणसूक्त (यजुर्वेद १३.४)

सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम्।
अर्थ:
वह परम नारायण देवता सहस्र मुखों और नेत्रों वाला है, जो सम्पूर्ण जगत को सुख देता है।

६. अन्तःप्रविष्टः शास्ता जनानां (नारायणसूक्त)

अर्थ:
वह परमात्मा सभी जीवों में भीतर प्रविष्ट होकर उन्हें संचालित करता है।

७. स नः पितेव सूनवे (ऋग्वेद १०.१९१.३)

अर्थ:
हे परमात्मा! जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है, वैसे ही आप हमारी रक्षा करें।

८. देवीसूक्त (ऋग्वेद १०.१२५.१)

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
अर्थ:
मैं (देवी) रुद्रों, वसुओं, आदित्यों और सभी देवताओं के साथ विचरण करती हूँ।

९. अहं ब्रह्मस्वरूपिणी (देवीसूक्त)

अर्थ:
मैं ही ब्रह्म की शक्ति हूँ, समस्त सृष्टि में व्याप्त हूँ।

१०. पृथ्वीसूक्त (अथर्ववेद १२.१.१२)

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।
अर्थ:
पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।

११. पृथिव्या ऊपरि द्यौः (अथर्ववेद)

अर्थ:
पृथ्वी और आकाश दोनों मिलकर हमें पोषण दें।

१२. अपां नपात् (ऋग्वेद २.३५.३)

अर्थ:
जल में निवास करने वाले अग्निदेव हमें जीवन और तेज दें।

 १३. अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत् (ऋग्वेद १.५९.१)

अर्थ:
अग्नि स्वर्ग के शिखर पर विराजमान हैं; वे सम्पूर्ण विश्व का आलोक हैं।

१४. आपो हि ष्ठा मयोभुवाः (ऋग्वेद १०.९.१)

अर्थ:
हे जल! तुम सुखदायी हो, हमें पवित्रता और आयु दो।

१५. ओ३म् हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे (ऋग्वेद १०.१२१.१)

अर्थ:
सृष्टि की उत्पत्ति के समय सबसे पहले ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) प्रकट हुए।

१६. एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (ऋग्वेद १.१६४.४६)

अर्थ:
सत्य एक ही है, परन्तु ज्ञानी लोग उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

१७. इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः (ऋग्वेद १.१६४.४६)

अर्थ:
इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि—ये सभी एक ही परम सत्य के रूप हैं।

१८. तत्सवितुर्वरेण्यं (ऋग्वेद ३.६२.१०)

अर्थ:
हम उस परम ज्योति का ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धियों को प्रकाशित करे।

१९. विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव (ऋग्वेद ३.६२.१०)

अर्थ:
हे सविता देव! हमारे सभी पापों और दोषों को दूर करें।

२०. अग्ने नय सुपथा (ऋग्वेद १.१८९.१)

अर्थ:
हे अग्निदेव! हमें शुभ मार्ग पर ले चलो।

२१. ऋतं च सत्यं च अभिधात् (ऋग्वेद १०.१९०.१)

अर्थ:
सत्य और ऋत (नियम) से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।

२२. वयं ते रुद्र प्रचेतसः (ऋग्वेद २.३३.११)

अर्थ:
हे रुद्रदेव! आपकी कृपा से हमें स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त हो।

२३. नमो अस्तु ते अस्तु (यजुर्वेद १६)

अर्थ:
हे रुद्र! आपको पुनः-पुनः नमस्कार, आप हमें कल्याण दें।

२४. ब्रह्मजज्ञानं प्रथमं पुरस्तात् (ऋग्वेद १०.८१.१)

अर्थ:
सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मज्ञान ही पहले प्रकट हुआ।

२५. न मोहनं कर्मणा जायते (अथर्ववेद)

अर्थ:
कर्म से मोह उत्पन्न नहीं होता जब वह निःस्वार्थ भाव से किया जाए।

২৬. वयं नामानि महतो अद्यस्य (ऋग्वेद)

अर्थ:
हम उस महान परमात्मा के पवित्र नामों का उच्चारण करते हैं।

२७. ब्रह्मा देवानाम्प्रथमो बभूव (ऋग्वेद १०.१२१.१)

अर्थ:
ब्रह्म ही सभी देवताओं में प्रथम है।

२८. आपो जनयथा च नः (ऋग्वेद)

अर्थ:
हे जलदेवता! हमें नवीन जीवन और स्वास्थ्य प्रदान करो।

२९. ओ३म् नमो भगवते वासुदेवाय (यजुर्वेद)

अर्थ:
हे वासुदेव! आपको नमस्कार, आप ही सबके पालनकर्ता हैं।

३०. ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः (सर्ववेदान्त)

अर्थ:
त्रिविध स्तरों — भौतिक, मानसिक और आत्मिक — पर शान्ति बनी रहे।

उपनिषदों के ३० उत्कृष्ट मन्त्र (हिन्दी अर्थ सहित)

१. ईशोपनिषद् (१)

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

अर्थ:
यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है; त्याग भाव से भोग करो और किसी के धन का लोभ मत करो।

२. ईशोपनिषद् (२)

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
अर्थ:
कर्तव्य कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए।

३. ईशोपनिषद् (९)

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
अर्थ:
जो केवल अज्ञान (भौतिक वस्तुओं) की पूजा करते हैं, वे अंधकार में प्रवेश करते हैं।

४. केनोपनिषद् (१.१)

केनेषितं पतति प्रेषितं मनः।
अर्थ:
मन किसके आदेश से चलता है? वाणी किससे प्रेरित होती है? — यही ब्रह्म का रहस्य है।

५. केनोपनिषद् (२.३)

यन्मनसा न मनुते येनाहुर् मनो मतम्।
अर्थ:
जिसे मन नहीं जान सकता, पर जिससे मन जानता है — वही ब्रह्म है।

६. कठोपनिषद् (१.२.१८)

नायमात्मा प्रवचननेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
अर्थ:
यह आत्मा न तो प्रवचन, न विद्या, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है, केवल जिस पर वह प्रसन्न होता है उसी को मिलती है।

७. कठोपनिषद् (२.२०)

अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
अर्थ:
आत्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है, जो सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।

८. कठोपनिषद् (१.२.२०)

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
अर्थ:
जागो, उठो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करो।

९. मुण्डकोपनिषद् (१.१.४)

द्वे विद्ये वेदितव्ये परा चापरा च।
अर्थ:
ज्ञान दो प्रकार का है — परा (आध्यात्मिक) और अपरा (भौतिक)।

१०. मुण्डकोपनिषद् (२.२.११)

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद्।
अर्थ:
ब्रह्म ही आगे, पीछे, ऊपर, नीचे — सब ओर व्याप्त है।

११. मुण्डकोपनिषद् (२.१.१)

परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्।
अर्थ:
ज्ञानी व्यक्ति कर्मों के परिणाम देखकर वैराग्य प्राप्त करता है।

१२. मुण्डकोपनिषद् (२.२.५)

यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं।
अर्थ:
जब साधक उस स्वर्णवर्ण परमात्मा को देखता है, तब वह अमर हो जाता है।

१३. माण्डूक्योपनिषद् (१)

ॐ इत्येतदक्षरं इदं सर्वम्।
अर्थ:
“ॐ” यह एक अक्षर ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।

१४. माण्डूक्योपनिषद् (७)

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं... स आत्मा स विज्ञेयः।
अर्थ:
जो न भीतर है, न बाहर, जो अव्यक्त है — वही आत्मा है, वही जानने योग्य है।

१५. तैत्तिरीयोपनिषद् (२.५)

सत्यं वद, धर्मं चर।
अर्थ:
सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो।

१६. तैत्तिरीयोपनिषद् (२.७)

मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव।
अर्थ:
माता, पिता और गुरु को देवता समान मानो।

१७. तैत्तिरीयोपनिषद् (३.६)

आनन्दाद् एव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।
अर्थ:
सभी प्राणी आनन्द से उत्पन्न हुए हैं, आनन्द में जीते हैं, और आनन्द में लीन हो जाते हैं।

१८. बृहदारण्यकोपनिषद् (१.४.१०)

अहं ब्रह्मास्मि।
अर्थ:
मैं ही ब्रह्म हूँ — आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं।

१९. बृहदारण्यकोपनिषद् (३.९.२६)

नेति नेति।
अर्थ:
ब्रह्म का स्वरूप शब्दों से परे है — यह नहीं, यह नहीं।

२०. बृहदारण्यकोपनिषद् (५.२.१)

असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।
अर्थ:
असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

२१. छान्दोग्योपनिषद् (६.८.७)

तत्त्वमसि।
अर्थ:
हे श्वेतकेतु! तू वही परम तत्व है — आत्मा ही ब्रह्म है।

२२. छान्दोग्योपनिषद् (३.१४.१)

सर्वं खल्विदं ब्रह्म।
अर्थ:
यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है।

२३. छान्दोग्योपनिषद् (८.१५.१)

य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः।
अर्थ:
वह आत्मा पापरहित, वृद्धिहीन और अमर है।

२४. ऐतरेयोपनिषद् (१.१.१)

आत्मा वै इदमेवाग्र आसीत्।
अर्थ:
प्रारम्भ में केवल आत्मा ही था, उसी से सब उत्पन्न हुआ।

२५. ऐतरेयोपनिषद् (३.१.३)

प्रज्ञानं ब्रह्म।
अर्थ:
बुद्धि और चेतना ही ब्रह्म है।

২৬. प्रश्नोपनिषद् (२.३)

सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।
अर्थ:
सूर्य ही चल और अचल सब प्राणियों का आत्मा है।

२७. प्रश्नोपनिषद् (६.५)

ओजो बलं च।
अर्थ:
जो सत्य का अनुसरण करता है, उसे बल और ओज प्राप्त होता है।

 

🔹 २८. श्वेताश्वतरोपनिषद् (३.८)

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
अर्थ:
मैं उस महान् पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य के समान प्रकाशमान और अंधकार से परे है।

२९. श्वेताश्वतरोपनिषद् (६.११)

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।
अर्थ:
एक ही परम देवता सब प्राणियों में छिपा हुआ है।

३०. श्वेताश्वतरोपनिषद् (४.१४)

सर्वव्यापी स भगवान् स्थावरं जङ्गमं च।
अर्थ:
भगवान सर्वव्यापक हैं — चल और अचल सबमें विद्यमान हैं।

संस्कृत के ३० प्रेरक श्लोक (नीति, चरित्र, सफलता, धर्म, जीवन-दर्शन)

स्रोत: चाणक्य नीति, महाभारत, मनुस्मृति, हितोपदेश, पंचतंत्र, नीति शास्त्र आदि
प्रत्येक श्लोक के साथ हिन्दी अर्थ 🌿

१. चाणक्य नीति

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

अर्थ:
केवल इच्छाएँ पूरी नहीं करतीं — प्रयास से ही सफलता मिलती है।

२. मनुस्मृति

धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

३. महाभारत

अहिंसा परमो धर्मः।
अर्थ:
अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।

४. नीति शतक (भर्तृहरि)

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
अर्थ:
विद्या मनुष्य का वास्तविक रूप है — यह छिपा हुआ धन है।

५. हितोपदेश

संतोषः परमं सुखम्।
अर्थ:
संतोष सबसे बड़ा सुख है।

६. चाणक्य नीति

मूर्खस्य पञ्च चिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः॥

अर्थ:
मूर्ख के पाँच लक्षण हैं — अहंकार, कटु वाणी, क्रोध, ज़िद और दूसरों की बात का अपमान।

७. महाभारत

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
अर्थ:
तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।

८. चाणक्य नीति

न हि सर्वत्र मित्राणि न सर्वत्र शत्रवः।

अर्थ:
हर जगह न मित्र होते हैं, न शत्रु — स्थिति के अनुसार व्यवहार करें।

९. नीति शतक

न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्यारत्नं सर्वधनप्रधानम्॥

अर्थ:
विद्या ऐसा धन है जिसे न चोर ले सकता है, न राजा छीन सकता है — यह खर्च करने से बढ़ती है।

१०. चाणक्य नीति

पराधीनः सुखं नास्ति।
अर्थ:
दूसरों पर निर्भर व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता।

११. हितोपदेश

आत्मनं सततं रक्षेत्।
अर्थ:
मनुष्य को हर समय अपने आचरण और आत्मा की रक्षा करनी चाहिए।

१२. नीति शतक

सत्सङ्गः कथयति चक्षुष्मता अन्धकारम्।
अर्थ:
सज्जनों का संग अज्ञानरूप अंधकार को दूर कर देता है।

१३. पंचतंत्र

शुभस्य शीघ्रम्।
अर्थ:
शुभ कार्य में विलंब नहीं करना चाहिए।

१४. चाणक्य नीति

एकमपि सुहृदं न लभ्यते शतसहस्रेष्वपि जन्तुषु।
अर्थ:
सच्चा मित्र लाखों में भी दुर्लभ होता है।

१५. महाभारत

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
अर्थ:
जो साधक स्थिर चित्त होकर ध्यान करता है, वह दीपक की तरह अचल होता है।

१६. मनुस्मृति

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
अर्थ:
सत्य बोलो, परंतु ऐसा सत्य जो प्रिय भी हो; अप्रिय सत्य नहीं कहना चाहिए।

१७. हितोपदेश

अनुकूलं यथा कालं, तत्सर्वत्र शुभं भवेत्।
अर्थ:
जो कार्य उचित समय पर किया जाए, वही सर्वश्रेष्ठ फल देता है।

१८. नीति शतक

धैर्यं सर्वत्र साधनम्।
अर्थ:
धैर्य हर सफलता की कुंजी है।

१९. वाल्मीकि रामायण

अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥

अर्थ:
सोने की लंका भी मुझे नहीं भाती, क्योंकि मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है।

२०. हितोपदेश

कालः सर्वं भस्मीकरोति।
अर्थ:
समय सब कुछ नष्ट कर देता है — अतः समय का सम्मान करो।

२१. नीति शतक

लज्जा श्रीर्व्रतमेव च।
अर्थ:
लज्जा, लक्ष्मी, और सत्य — इनका पालन स्त्री और पुरुष दोनों के लिए आवश्यक है।

 २२. पंचतंत्र

धैर्यं सर्वत्र विजयी।
अर्थ:
धैर्यवान व्यक्ति हर स्थिति में विजयी होता है।

२३. चाणक्य नीति

सुखार्थिनः कुतो विद्या, नास्तिकस्य कुतो यशः।
अर्थ:
जो केवल सुख चाहता है, उसे विद्या नहीं मिलती; जो निष्ठाहीन है, उसे यश नहीं मिलता।

२४. मनुस्मृति

शमं च दमनं चैव तप एव च शौचकम्।
अर्थ:
शान्ति, आत्मसंयम, तप और शुद्धता — यही मनुष्य के गुण हैं।

२५. नीति शतक

न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेत्।
अर्थ:
छोटे लाभ के लिए बड़ा नुकसान नहीं करना चाहिए।

২৬. महाभारत

वयस्सा किं प्रयोजनं यदि न विद्या।
अर्थ:
यदि ज्ञान न हो तो आयु का क्या उपयोग?

२७. चाणक्य नीति

न हि कश्चिद् अपि ज्ञानं सर्वं जानाति तत्त्वतः।
अर्थ:
कोई भी व्यक्ति सम्पूर्ण ज्ञान नहीं जान सकता।

२८. नीति शतक

सर्वं परवशं दुःखं, सर्वमात्मवशं सुखम्।
अर्थ:
दूसरों पर निर्भरता दुःख है; आत्मनियंत्रण सुख है।

२९. हितोपदेश

विवेकः सर्वधनाधिपः।
अर्थ:
विवेक सबसे बड़ा धन है — यह सभी सम्पदाओं का स्वामी है।

३०. नीति शतक

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे क्षणे यत्पर्यन्तं तदक्षयं भवेत्॥

अर्थ:
विद्या और धन को धीरे-धीरे, धैर्यपूर्वक अर्जित करो — तभी वे स्थायी होते हैं।

३० देवी–देवता सम्बन्धी संस्कृत मन्त्र (हिन्दी अर्थ सहित)
— शिव, विष्णु, लक्ष्मी, दुर्गा, गणेश, सरस्वती, सूर्य, हनुमान आदि देवताओं के लिए चयनित वैदिक एवं पुराणिक मन्त्र 

 भाग ६ — ३० दिव्य मन्त्र (देवी-देवताओं के)

१. श्री गणेश मन्त्र

ॐ गं गणपतये नमः।
अर्थ:
हे विघ्नहर्ता गणेश जी! आपको नमस्कार — आप हमारी बुद्धि को शुभ बनाएं।

२. शिव मन्त्र (महामृत्युञ्जय)

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
अर्थ:
हम त्रिनेत्रधारी शिव की उपासना करते हैं; वे हमें मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें।

३. विष्णु मन्त्र

ॐ नमो नारायणाय।
अर्थ:
सर्वव्यापक भगवान नारायण को नमस्कार।

४. लक्ष्मी मन्त्र

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।
अर्थ:
हे महालक्ष्मी! आप हमें धन, सौभाग्य और शुद्धता प्रदान करें।

५. सरस्वती मन्त्र

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।
अर्थ:
हे विद्यादायिनी माँ सरस्वती! हमें ज्ञान और वाणी की शुद्धि दें।

६. दुर्गा मन्त्र

ॐ दुं दुर्गायै नमः।
अर्थ:
हे दुर्गे! आप हमारी सभी विपत्तियों को दूर करें।

७. सूर्य मन्त्र (गायत्री)

ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि।
तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥
अर्थ:
हे सूर्यदेव! हमें तेज, ज्ञान और शक्ति प्रदान करें।

८. हनुमान मन्त्र

ॐ हनुमते नमः।
अर्थ:
हे पवनसुत हनुमान! आप हमें बल, बुद्धि और निर्भयता दें।

९. पार्वती मन्त्र

ॐ ह्रीं पार्वत्यै नमः।
अर्थ:
हे पार्वती माता! आप हमें करुणा और सौभाग्य प्रदान करें।

१०. राम मन्त्र

ॐ श्रीरामाय नमः।
अर्थ:
हे भगवान श्रीराम! हमें धर्म, मर्यादा और सत्य के मार्ग पर चलाएँ।

११. कृष्ण मन्त्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अर्थ:
सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण (वासुदेव) को नमस्कार।

१२. राधा मन्त्र

ॐ ह्रीं राधायै नमः।
अर्थ:
हे राधे! आप प्रेम, भक्ति और करुणा की ज्योति प्रकट करें।

१३. शिव-शक्ति संयुक्त मन्त्र

ॐ नमः शिवायै च शिवाय च।
अर्थ:
शिव और शक्ति, दोनों को प्रणाम — जो सृष्टि के दो पहलू हैं।

१४. ब्रह्मा मन्त्र

ॐ नमो ब्रह्मणे।
अर्थ:
सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा जी को नमस्कार।

१५. विष्णु सहस्रनाम का बीज

ॐ विष्णवे नमः।
अर्थ:
सबका पालन करने वाले विष्णु को नमस्कार।

१६. रुद्र मन्त्र (यजुर्वेद)

ॐ नमो भगवते रुद्राय।
अर्थ:
सभी रूपों में विद्यमान रुद्रदेव को नमस्कार।

१७. स्कन्द (कार्तिकेय) मन्त्र

ॐ स्कन्दाय नमः।
अर्थ:
हे कार्तिकेय! हमें साहस और विजय प्रदान करें।

१८. काली मन्त्र

ॐ क्रीं कालिकायै नमः।
अर्थ:
हे माँ काली! आप हमारे भय और अज्ञान का नाश करें।

१९. दत्तात्रेय मन्त्र

ॐ दत्तात्रेयाय नमः।
अर्थ:
गुरु-त्रिमूर्ति भगवान दत्तात्रेय को नमस्कार।

२०. नारसिंह मन्त्र

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युः नमाम्यहम्॥
अर्थ:
मैं उस उग्र, परन्तु कल्याणकारी नृसिंह भगवान को नमस्कार करता हूँ जो मृत्यु के भी संहारक हैं।

२१. दुर्गा सप्तशती मन्त्र

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ:
जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार।

२२. सरस्वती स्तुति

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
अर्थ:
हे श्वेतवस्त्रधारिणी, ज्ञान-मूर्ति माँ सरस्वती! हमें बुद्धि और विवेक दें।

২৩. लक्ष्मी स्तोत्र (श्रीसूक्त)

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
अर्थ:
हे स्वर्णवर्णा देवी लक्ष्मी! आप समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री हैं।

२४. सूर्य उपासना मन्त्र

आदित्याय नमः।
अर्थ:
सूर्यदेव को प्रणाम — जो जीवन और प्रकाश के स्रोत हैं।

२५. शिव पंचाक्षरी मन्त्र

ॐ नमः शिवाय।
अर्थ:
हे शिव! आप कल्याण के दाता हैं — आपको नमस्कार।

२६. दुर्गा कवच मन्त्र

ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि।
तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
अर्थ:
हे माँ दुर्गा! हमें शक्ति और बुद्धि प्रदान करें।

२७. विष्णु-लक्ष्मी संयुक्त मन्त्र

ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः।
अर्थ:
हे लक्ष्मी-नारायण! आप धन, धर्म और सौभाग्य के रक्षक हैं।

२८. गणेश गायत्री

ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात्॥
अर्थ:
हम एकदन्त भगवान गणेश का ध्यान करते हैं — वे हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।

२९. हनुमान स्तुति

आञ्जनेय मतिपाटलाननं कान्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्।
अर्थ:
हे तेजस्वी हनुमान! आप सोने के पर्वत समान उज्ज्वल हैं — हमारी रक्षा करें।

३०. सार्वभौम शान्ति मन्त्र (सर्वदेव स्तुति)

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः॥
अर्थ:
आकाश, पृथ्वी, जल, औषधि, वृक्ष, देवता — सबमें शान्ति हो।

ये ३० मन्त्र वेद, उपनिषद् और पुराण — तीनों परंपराओं से लिए गए हैं।
इनमें भक्ति, ध्यान और साधना के सभी प्रमुख देवताओं की स्तुति सम्मिलित है।

भाग ७ — ३० "सकारात्मक जीवन-प्रेरक संस्कृत उद्धरण" (Motivational Quotes in Sanskrit with Hindi Meaning)
जो आधुनिक जीवन-संदर्भों में उपयोगी होंगे — नेतृत्व, आत्मविश्वास, कर्म, प्रेम, सफलता आदि पर आधारित?

भाग ७ — ३० प्रेरक संस्कृत उद्धरण (Motivational Quotes in Sanskrit with Hindi अर्थ)

आधुनिक जीवन में अपनाने योग्य — आत्मविश्वास, परिश्रम, नैतिकता, नेतृत्व, सफलता, और संतुलन पर आधारित 

१.उद्यमः पुरुषस्य लक्षणम्।
अर्थ:
परिश्रम ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

 

२.सफलतां न प्रयच्छन्ति दुर्बलाय कदाचन।
अर्थ:
सफलता कभी भी कमजोर व्यक्ति को नहीं मिलती।

 

३.यथा चिन्तयति मनः, तथा भवति।
अर्थ:
जैसा मन सोचता है, वैसा ही जीवन बनता है।

 

४.नित्यं यत्नं समारभ्य सिद्धिं प्राप्नुयात् नरः।
अर्थ:
जो व्यक्ति निरंतर प्रयास करता है, वही सफलता प्राप्त करता है।

 

५.न हि परिश्रमसमानं धनम्।
अर्थ:
परिश्रम से बड़ा कोई धन नहीं।

 

६.स्वयमेव मृगः प्रेत्य न प्रविशति मुखं सिंहस्य।
अर्थ:
शेर के मुँह में मृग स्वयं नहीं आता — मेहनत करनी ही पड़ती है।

 

७.धीरे-धीरे पिपीलिका अपि पर्वतं आरोहति।
अर्थ:
धीरे-धीरे चलने वाली चींटी भी पर्वत पर चढ़ जाती है।

 

८.वृक्षः फलैः परिचीयते।
अर्थ:
वृक्ष अपने फलों से, और मनुष्य अपने कर्मों से पहचाना जाता है।

 

९.अभ्यासेन सिद्धिर्भवति।
अर्थ:
निरंतर अभ्यास से ही सिद्धि प्राप्त होती है।

 

१०.आत्मविश्वासः सफलतायाः मूलम्।
अर्थ:
आत्मविश्वास ही सफलता की जड़ है।

११.कर्मणि व्यज्यते व्यक्तिः।
अर्थ:
व्यक्ति का असली स्वरूप उसके कर्मों से प्रकट होता है।

 

१२.विचारः परमं बलम्।
अर्थ:
सही विचार सबसे बड़ी शक्ति है।

 

१३.समयः सर्वस्य धनम्।
अर्थ:
समय ही सबसे बड़ा धन है।

 

१४.धैर्यं सर्वत्र विजयाय कारणम्।
अर्थ:
धैर्य ही हर विजय का कारण है।

 

१५.अवसरः दुर्लभः।
अर्थ:
अवसर दुर्लभ होता है — उसे पहचानो और उपयोग करो।

 

१६.न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
अर्थ:
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं।

 

१७.यथा दीपो न वातेन लोलयते, तथा ध्यायिन् स्थिरः भवेत्।
अर्थ:
जैसे बिना हवा का दीपक अचल रहता है, वैसे ही ध्यान करने वाला मनुष्य स्थिर रहता है।

 

१८.सत्कर्मणि रताः सदा सुखिनः।
अर्थ:
जो सदा अच्छे कर्मों में लगे रहते हैं, वे सदैव सुखी रहते हैं।

 

१९.न शक्यं तु विनोदयितुं दुःखितं कर्मविना।
अर्थ:
दुःख का निवारण केवल कर्म से ही संभव है।

 

२०.विपत्तिषु धैर्यं, सम्पत्तिषु विनयः।
अर्थ:
कठिन समय में धैर्य और सफलता में विनम्रता ही श्रेष्ठ गुण हैं।

 

२१.नित्यं स्मरेत् शुभं कार्यम्।
अर्थ:
हर दिन शुभ कर्म का संकल्प लो।

 

२२.अकर्मणः न भवति कीर्तिः।
अर्थ:
निष्क्रिय व्यक्ति कभी प्रसिद्धि नहीं पा सकता।

 

२३.स्वधर्मे निधनं श्रेयः।
अर्थ:
अपने धर्म में स्थिर रहना ही श्रेष्ठ है।

 

२४.शान्तिः परमो लाभः।
अर्थ:
शान्ति ही सबसे बड़ा लाभ है।

 

२५.सङ्गच्छध्वं सम्वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
(ऋग्वेद १०.१९१.२)
अर्थ:
मिल-जुलकर चलो, एक साथ विचार करो, एक-दूसरे के मन को जानो।

 

२६.भवतु सर्वमङ्गलं।
अर्थ:
सबका कल्याण हो — यही सच्चा धर्म है।

 

२७.सत्यमेव जयते।
अर्थ:
सत्य की ही सदा विजय होती है।

 

२८.आत्मा बलं परमं।
अर्थ:
आत्मबल ही सर्वोच्च शक्ति है।

 

२९.प्रेमः सर्वत्र सेतुर्भवति।
अर्थ:
प्रेम हर हृदय को जोड़ने वाला पुल है।

 

३०.सदा स्मितं मुखे धारयेत्।
अर्थ:
हमेशा मुस्कान बनाए रखो — यही जीवन की सच्ची शोभा है।


ये ३० प्रेरक संस्कृत उद्धरण आत्मबल, धैर्य, प्रेम और सफलता का अमृत-सार हैं —
जिन्हें दैनिक ध्यान, विद्यालय, भाषण या जीवन मार्गदर्शन में प्रयोग किया जा सकता है।

सरल संस्कृत श्लोक बच्चों के लिए (हिंदी अर्थ सहित)

ये श्लोक छोटे बच्चों के लिए हैं — याद करने में आसान, सरल भाषा, नैतिक शिक्षा और सच्चाई, धर्म, संस्कार सिखाने वाले।

१. सत्यं वद।

अर्थ:
सत्य बोलो।

२. धर्मं चर।

अर्थ:
धर्म का पालन करो।

३. मातरं पूज्य।

अर्थ:
माँ का सम्मान करो।

पितरं पूज्य।

अर्थ:
पिता का सम्मान करो।

५. गुरुम् मान्य।

अर्थ:
गुरु का आदर करो।

६. मित्रं सत्कुरु।

अर्थ:
मित्र के साथ सद्गुण कर।

७. अन्नं न व्यर्थं कुरु।

अर्थ:
खाना व्यर्थ न फेंको।

८. पाणिनि शुद्धाः।

अर्थ:
हाथ हमेशा साफ रखो।

९. पादौ शुद्धौ।

अर्थ:
पाँव हमेशा स्वच्छ रखो।

१०. वचनं शुद्धं।

अर्थ:
शब्द हमेशा शुद्ध और सच्चे बोलो।

११. मातृभक्तिः परमं।

अर्थ:
माँ की सेवा सर्वोच्च है।

१२. पितृभक्तिः महान्।

अर्थ:
पिता की सेवा महान है।

१३. सदा हस।

अर्थ:
हमेशा हंसते रहो।

१४. क्रोधं त्यज।

अर्थ:
गुस्सा त्यागो।

१५. मदं त्यज।

अर्थ:
अहंकार त्यागो।

१६. मित्रं सहाय।

अर्थ:
मित्र की मदद करो।

१७. शत्रुं क्षम।

अर्थ:
शत्रु को भी क्षमा करो।

१८. ज्ञानं प्रयच्छ।

अर्थ:
ज्ञान प्राप्त करो।

१९. विद्यां प्रियं कुरु।

अर्थ:
शिक्षा को प्रिय बनाओ।

२०. कर्मण्येवाधिकारः।

अर्थ:
सिर्फ कर्म करना तुम्हारा अधिकार है।

२१. सदा शुद्धा चिन्ता।

अर्थ:
हमेशा अच्छे विचार रखो।

२२. अहिंसा परमो धर्मः।

अर्थ:
हिंसा न करना सर्वोच्च धर्म है।

२३. पयः पिब।

अर्थ:
स्वच्छ पानी पियो।

२४. आहारं सम्यक्।

अर्थ:
संतुलित आहार लो।

२५. व्यायामं कुरु।

अर्थ:
नियमित व्यायाम करो।

२६. निद्रां यथासमयम्।

अर्थ:
समय पर सोओ।

२७. शौचं परं सुखम्।

अर्थ:
साफ-सफाई में ही सुख है।

२८. मित्रता अमूल्यं।

अर्थ:
सच्चा मित्र सबसे बड़ा धन है।

२९. क्रीड़ा सुखदं।

अर्थ:
खेल-खिलौने में आनंद है।

३०. सदा सत्कार्ये रम।

अर्थ:
हमेशा अच्छे कार्यों में रमते रहो।

३० सफलता और स्वास्थ्य सम्बन्धी संस्कृत मन्त्र एवं श्लोक (हिंदी अर्थ सहित)

ये मन्त्र और श्लोक व्यावहारिक जीवन में स्वास्थ्य, मानसिक शक्ति, सफलता, और सकारात्मक ऊर्जा के लिए उपयोगी हैं।

१. आयुर्वेद मंत्र

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
अर्थ:
सभी लोग सुखी और रोगमुक्त रहें।

२. स्वास्थ्य मन्त्र

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
अर्थ:
हे त्रिनेत्रधारी शिव! हमें बल, स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करें।

३. प्राणायाम प्रेरक श्लोक

श्वासोऽन्यः प्राणस्य साधनम्।
अर्थ:
स्वस्थ जीवन के लिए श्वास नियंत्रण आवश्यक है।

४. कर्मफल सिद्धि मन्त्र

कर्मण्येवाधिकारः ते मा फलेषु कदाचन।
अर्थ:
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।

५. ऊर्जा बढ़ाने वाला मन्त्र

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
अर्थ:
हे देवताओं! हम सभी के लिए शुभ बातें सुनें और शक्ति दें।

६. सकारात्मक ऊर्जा मंत्र

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
अर्थ:
मन, शरीर और वातावरण में शांति बनी रहे।

७. बुध्दि बल मंत्र

ॐ ह्रीं बुद्ध्यै नमः।
अर्थ:
हे देवी बुद्धि! आप हमारी सोच और निर्णय शक्ति को प्रबल करें।

८. साहस बढ़ाने वाला श्लोक

धैर्यं सर्वत्र विजयाय कारणम्।
अर्थ:
धैर्य ही हर विजय का आधार है।

९. तनाव निवारण मंत्र

ॐ मणिपद्मे हूँ।
अर्थ:
तनाव और नकारात्मकता को शांत करने वाला बौद्धिक मंत्र।

१०. सफलता मंत्र

सफलतायै नित्यं यत्नः।
अर्थ:
सफलता के लिए निरंतर प्रयास जरूरी है।

११. शक्ति और ऊर्जा

ॐ नमो नारायणाय।
अर्थ:
सर्वव्यापक भगवान नारायण से शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

१२. मानसिक स्वास्थ्य मंत्र

ॐ ह्लीं सर्वसंतापशमनाय।
अर्थ:
सभी प्रकार के मानसिक तनाव का नाश करने वाला मंत्र।

१३. रोग निवारण मंत्र

ॐ आयुर्वेदाय नमः।
अर्थ:
स्वास्थ्य और दीर्घायु के देवता को प्रणाम।

१४. ऊर्जा और उत्साह

उद्यमः पुरुषस्य लक्षणम्।
अर्थ:
परिश्रम ही जीवन में सफलता और ऊर्जा का स्रोत है।

१५. सकारात्मक सोच

यथा चिन्तयति मनः, तथा भवति।
अर्थ:
जैसा मन सोचता है, वैसा ही जीवन बनता है।

१६. संतुलन श्लोक

मध्यम मार्गः परम सुखम्।
अर्थ:
संतुलित जीवन सबसे बड़ा सुख है।

१७. स्वस्थ शरीर मंत्र

शरीरं शिवं व्रज।
अर्थ:
शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाओ।

१८. आहार मंत्र

आहारं सम्यक्।
अर्थ:
संतुलित और पोषक आहार लो।

१९. व्यायाम श्लोक

व्यायामः शरीरस्य मित्रम्।
अर्थ:
व्यायाम शरीर का सच्चा मित्र है।

२०. निद्रा मंत्र

निद्रां यथासमयम्।
अर्थ:
समय पर सोओ — स्वस्थ मन और शरीर के लिए।

२१. तनाव नियंत्रण

शान्तिः परमो लाभः।
अर्थ:
शांति ही सबसे बड़ा लाभ है।

२२. रोग निवारण श्लोक

सर्वे सन्तु निरामयाः।
अर्थ:
सभी लोग रोगमुक्त रहें।

२३. उत्साह मंत्र

सदैव स्मितं धारयेत्।
अर्थ:
हमेशा हंसते और उत्साहित रहो।

२४. आत्मविश्वास श्लोक

आत्मविश्वासः सफलतायाः मूलम्।
अर्थ:
सफलता का मूल आत्मविश्वास है।

२५. शक्ति श्लोक

आत्मा बलं परमं।
अर्थ:
आत्मबल ही सर्वोच्च शक्ति है।

२६. सफलता मंत्र

नित्यं यत्नं समारभ्य सिद्धिं प्राप्नुयात्।
अर्थ:
निरंतर प्रयास से ही सफलता मिलती है।

२७. ध्यान मंत्र

योगः कर्मसु कौशलम्।
अर्थ:
कर्म में निपुणता ही योग है।

२८. शांति मंत्र

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः।
अर्थ:
आकाश, पृथ्वी, जल — सबमें शांति हो।

२९. स्वास्थ्य मंत्र

शरीरं ध्येयमुत्तमम्।
अर्थ:
शरीर को सर्वोच्च ध्यान में रखो।

३०. समग्र सफलता मंत्र

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
अर्थ:
सभी सुखी और रोगमुक्त रहें — यही समग्र सफलता है।


 

भाग १० — ३० “संपूर्ण वेद मंत्र, श्लोक और स्तोत्रों का संग्रह”
जिसमें सभी प्रमुख वेदिक मंत्र, स्तोत्र और श्लोक होंगे, अर्थ सहि

प्रमुख वेदिक मंत्र, श्लोक और स्तोत्र (हिंदी अर्थ सहित)

यह भाग संपूर्ण वेद, मंत्र, स्तोत्र का संग्रह है, जिसे आप ध्यान, पूजा, अध्यात्मिक अध्ययन और दैनिक जीवन में उपयोग कर सकते हैं।

१. ॐ (ओम)

अर्थ:
सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म का प्रतीक, आत्मा और ब्रह्म का सर्वश्रेष्ठ ध्वनि।

२. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अर्थ:
हे भगवान वासुदेव! मैं आपका सम्मान करता हूँ।

३. ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः

अर्थ:
सभी लोग सुखी रहें।

४. ॐ त्रयम्बकं यजामहे

अर्थ:
त्रिनेत्रधारी भगवान शिव! हमें स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगमुक्त जीवन दें।

५. गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
अर्थ:
हम उस दिव्य सूर्य का ध्यान करें जो जीवन में ज्ञान और शक्ति प्रदान करता है।

६. ऋग्वेद १०.८.९

अर्थ:
हे देवताओं! हमें शुभ और मंगलमय जीवन प्रदान करें।

७. नमो नारायणाय

अर्थ:
सर्वव्यापक भगवान नारायण को प्रणाम।

८. ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

अर्थ:
माँ चामुण्डा की आराधना करने वाला शक्तिशाली मन्त्र।

९. हनुमान चालीसा (प्रारंभिक श्लोक)

अर्थ:
श्री हनुमान की स्तुति, जो शक्ति, साहस और विजय देती है।

१०. महा मृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्
अर्थ:
हे भगवान शिव! मृत्यु और रोगों से हमें मुक्ति दें और हमें अमरत्व की ओर ले जाएँ।

११. नारायण स्तोत्र (प्रारंभ)

अर्थ:
भगवान नारायण की स्तुति, जो समस्त जगत के पालनहार हैं।

१२. विष्णु सहस्रनाम

अर्थ:
भगवान विष्णु के १००० नामों की स्तुति।

१३. शिव तांडव स्तोत्र (प्रारंभिक श्लोक)

अर्थ:
भगवान शिव के तांडव नृत्य का वर्णन, शक्ति, साहस और जागरूकता का स्त्रोत।

१४. लक्ष्मी मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
अर्थ:
धन, समृद्धि और सुख की देवी महालक्ष्मी को प्रणाम।

१५. सरस्वती मंत्र

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
अर्थ:
ज्ञान और कला की देवी सरस्वती को प्रणाम।

१६. दुर्गा मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं दुर्गायै नमः
अर्थ:
संकट और बुराई से रक्षा करने वाली देवी दुर्गा को प्रणाम।

१७. गणेश मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः
अर्थ:
सफलता और बाधा रहित कार्य के लिए भगवान गणेश को प्रणाम।

१८. सूर्य मंत्र

ॐ सूर्याय नमः
अर्थ:
सूर्य देव को प्रणाम — ऊर्जा और जीवनदायिनी शक्ति के लिए।

१९. अग्नि मंत्र

ॐ अग्नये नमः
अर्थ:
अग्नि देव को प्रणाम — ज्ञान और पवित्रता के लिए।

२०. इन्द्र मंत्र

ॐ इन्द्राय नमः
अर्थ:
वृष्टि और शक्ति के देवता इन्द्र को प्रणाम।

२१. वायु मंत्र

ॐ वायवे नमः
अर्थ:
वायु देव को प्रणाम — जीवन और स्वास्थ्य के लिए।

२२. वरुण मंत्र

ॐ वरुणाय नमः
अर्थ:
जल देव वरुण को प्रणाम — शुद्धता और जीवनदायिनी शक्ति के लिए।

२३. सप्तऋषि मंत्र

अर्थ:
सप्त ऋषियों को प्रणाम — ज्ञान और जीवन में मार्गदर्शन के लिए।

२४. भैरव मंत्र

ॐ भैरवाय नमः
अर्थ:
भैरव भगवान को प्रणाम — भय और नकारात्मकता से मुक्ति के लिए।

२५. ऐश्वर्य मंत्र

ॐ ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
अर्थ:
संपत्ति, सुख और समृद्धि के लिए देवी को प्रणाम।

२६. शांति मंत्र

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः।
अर्थ:
आकाश और पृथ्वी में शांति बनी रहे।

२७. ब्रह्म मंत्र

ॐ ब्रह्मणे नमः
अर्थ:
सर्वशक्तिमान ब्रह्मा को प्रणाम।

२८. जीवन मंत्र

ॐ सर्वात्मने नमः
अर्थ:
सर्वात्मा यानी आत्मा में निहित ईश्वर को प्रणाम।

२९. गुरु मंत्र

ॐ गुरवे नमः
अर्थ:
गुरु को प्रणाम — ज्ञान और मार्गदर्शन के लिए।

३०. समग्र वेदिक संकल्प मंत्र

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
अर्थ:
सभी लोग सुखी, रोगमुक्त और सुरक्षित रहें। सभी को मंगल प्राप्त हो। शांति हो।

संस्कृत मंत्र और श्लोक (हिंदी अर्थ सहित, सुपर संग्रह)

यह संग्रह सभी प्रकार के मंत्र, श्लोक, स्तोत्र और वेदिक मन्त्रोच्चारण का संपूर्ण संकलन है। इसे आप ध्यान,पूजा, स्वास्थ्य, सफलता, नैतिक शिक्षा और दैनिक जीवन में प्रयोग कर सकते हैं।

१–१०: मूल वेदिक मंत्र

  1. ॐ – सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म का प्रतीक।
     

  2. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय – भगवान वासुदेव को प्रणाम।
     

  3. ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः – सभी लोग सुखी रहें।
     

  4. ॐ त्रयम्बकं यजामहे – शिव से स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना।
     

  5. गायत्री मंत्र – ज्ञान और दिव्यता के लिए।
     

  6. ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे – शक्ति और सुरक्षा के लिए।
     

  7. ॐ गं गणपतये नमः – बाधा रहित कार्य के लिए।
     

  8. ॐ नमो नारायणाय – नारायण भगवान को प्रणाम।
     

  9. ॐ सूर्याय नमः – सूर्य देव को प्रणाम।
     

  10. ॐ आयुर्वेदाय नमः – स्वास्थ्य और जीवनदायिनी शक्ति के लिए।
     

११–२०: स्वास्थ्य और मानसिक शक्ति मंत्र

  1. ॐ ह्रीं सर्वसंतापशमनाय – तनाव निवारण।
     

  2. श्वासोऽन्यः प्राणस्य साधनम् – प्राणायाम का महत्व।
     

  3. धैर्यं सर्वत्र विजयाय कारणम् – धैर्य से ही विजय संभव।
     

  4. सदैव स्मितं धारयेत् – हमेशा हंसते रहो।
     

  5. योगः कर्मसु कौशलम् – कर्म में निपुणता ही योग।
     

  6. आत्मविश्वासः सफलतायाः मूलम् – सफलता का मूल आत्मविश्वास।
     

  7. व्यायामः शरीरस्य मित्रम् – व्यायाम से स्वास्थ्य।
     

  8. निद्रां यथासमयम् – समय पर निद्रा।
     

  9. शरीरं ध्येयमुत्तमम् – शरीर की सुरक्षा और स्वास्थ्य।
     

  10. सर्वे सन्तु निरामयाः – सभी रोगमुक्त रहें।
     

२१–३०: सफलता और सकारात्मक ऊर्जा मंत्र

  1. कर्मण्येवाधिकारः ते मा फलेषु कदाचन – केवल कर्म करो, फल की चिंता न करो।
     

  2. सफलतायै नित्यं यत्नः – सफलता के लिए निरंतर प्रयास।
     

  3. सदा शुद्धा चिन्ता – अच्छे विचार बनाए रखें।
     

  4. आत्मा बलं परमं – आत्मबल ही सबसे बड़ी शक्ति।
     

  5. सर्वात्मने नमः – आत्मा में निहित ईश्वर को प्रणाम।
     

  6. उद्यमः पुरुषस्य लक्षणम् – प्रयास से ही जीवन में सफलता।
     

  7. मध्यम मार्गः परम सुखम् – संतुलित जीवन का महत्व।
     

  8. सर्वे भद्राणि पश्यन्तु – सभी शुभ देखें।
     

  9. मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् – किसी को दुःख न मिले।
     

  10. ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः – सम्पूर्ण शांति।
     

३१–४०: देवी और देवता स्तोत्र

  1. ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः – लक्ष्मी माता को प्रणाम।
     

  2. ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः – ज्ञान और कला की देवी।
     

  3. ॐ ऐं ह्रीं क्लीं दुर्गायै नमः – देवी दुर्गा को प्रणाम।
     

  4. ॐ भैरवाय नमः – भैरव भगवान को प्रणाम।
     

  5. ॐ गुरवे नमः – गुरु को प्रणाम।
     

  6. ॐ ब्रह्मणे नमः – ब्रह्मा को प्रणाम।
     

  7. ॐ वायवे नमः – वायु देव को प्रणाम।
     

  8. ॐ वरुणाय नमः – जल देव वरुण को प्रणाम।
     

  9. ॐ इन्द्राय नमः – इन्द्र देव को प्रणाम।
     

  10. ॐ अग्नये नमः – अग्नि देव को प्रणाम।
     

४१–५०: हनुमान और शिव स्तोत्र

  1. हनुमान चालीसा (प्रारंभिक श्लोक) – शक्ति और साहस के लिए।
     

  2. ॐ नमः शिवाय – शिव भगवान को प्रणाम।
     

  3. शिव तांडव स्तोत्र (प्रारंभ) – शक्ति और जागरूकता।
     

  4. महामृत्युंजय मंत्र – मृत्यु और रोगों से मुक्ति।
     

  5. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् – रोग निवारण।
     

  6. ॐ नमो भगवते रुद्राय – रुद्र भगवान को प्रणाम।
     

  7. ॐ कालाय नमः – काल (समय) की शक्ति के लिए।
     

  8. ॐ भूतनाथाय नमः – भूतनाथ भगवान को प्रणाम।
     

  9. ॐ त्रैलोक्यनाथाय नमः – त्रिलोकपाल भगवान को प्रणाम।
     

  10. ॐ भूतभव्यभवाय नमः – भूत, वर्तमान और भविष्य के लिए।
     

५१–६०: ज्ञान और शिक्षा मंत्र

  1. विद्यां प्रियं कुरु – शिक्षा को प्रिय बनाओ।
     

  2. ज्ञानं प्रयच्छ – ज्ञान प्राप्त करो।
     

  3. ॐ ह्रीं बुद्ध्यै नमः – बुद्धि को प्रबल करने के लिए।
     

  4. सर्वविद्याधनं समर्पयामि – समस्त ज्ञान की प्राप्ति।
     

  5. ध्यानं कुरु – ध्यान और मानसिक शक्ति।
     

  6. मातृभक्तिः परमं – माता की सेवा सर्वोच्च है।
     

  7. पितृभक्तिः महान् – पिता की सेवा महान।
     

  8. गुरुभक्तिः सर्वोत्तम – गुरु को सम्मान।
     

  9. सर्वे भवन्तु ज्ञानिनः – सभी लोग ज्ञान प्राप्त करें।
     

  10. सर्वे भवंतु धर्मिनः – सभी धर्म का पालन करें।
     

६१–७०: नैतिक शिक्षा श्लोक

  1. सत्यं वद – सत्य बोलो।
     

  2. धर्मं चर – धर्म का पालन करो।
     

  3. क्रोधं त्यज – गुस्सा त्यागो।
     

  4. मदं त्यज – अहंकार त्यागो।
     

  5. मित्रं सहाय – मित्र की मदद करो।
     

  6. शत्रुं क्षम – शत्रु को क्षमा करो।
     

  7. अन्नं न व्यर्थं कुरु – भोजन को व्यर्थ न करो।
     

  8. शौचं परं सुखम् – स्वच्छता में सुख है।
     

  9. पयः पिब – स्वच्छ पानी पियो।
     

  10. आहारं सम्यक् – संतुलित आहार लो।
     

७१–८०: जीवन और स्वास्थ्य मंत्र

  1. व्यायामं कुरु – नियमित व्यायाम।
     

  2. निद्रां यथासमयम् – समय पर सोना।
     

  3. सदा हस – हमेशा हंसो।
     

  4. शारीरिक शक्ति मन्त्र – शरीर को मजबूत बनाओ।
     

  5. मानसिक शक्ति मन्त्र – मानसिक शक्ति बढ़ाओ।
     

  6. सर्वे रोगमुक्ताः भवन्तु – सभी रोगमुक्त रहें।
     

  7. शान्तिः परमो लाभः – शांति ही सर्वोच्च लाभ।
     

  8. आत्मबलं परमं – आत्मबल सर्वोच्च।
     

  9. सर्वात्मने नमः – आत्मा में ईश्वर को प्रणाम।
     

  10. सर्वे सुखिनो भवन्तु – सभी सुखी रहें।
     

८१–९०: सफलता और समृद्धि मंत्र

  1. सदा सत्कार्ये रम – अच्छे कार्यों में रमणीय।
     

  2. सर्वे भद्राणि पश्यन्तु – सभी शुभ देखें।
     

  3. मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् – किसी को दुःख न मिले।
     

  4. सर्वे सन्तु निरामयाः – सभी रोगमुक्त रहें।
     

  5. सफलतायै नित्यं यत्नः – सफलता के लिए प्रयास।
     

  6. आत्मविश्वासः सफलतायाः मूलम् – आत्मविश्वास से सफलता।
     

  7. उद्यमः पुरुषस्य लक्षणम् – प्रयास से जीवन सफल।
     

  8. मध्यम मार्गः परम सुखम् – संतुलित जीवन।
     

  9. सर्वे भवन्तु ज्ञानिनः – सभी ज्ञान प्राप्त करें।
     

  10. सर्वे भवंतु धर्मिनः – सभी धर्म का पालन करें।
     

९१–१००+: शांति, भक्ति और दिव्यता मंत्र

  1. ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः – आकाश और पृथ्वी में शांति।
     

  2. ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः – सम्पूर्ण शांति।
     

  3. ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः – सभी सुखी रहें।
     

  4. ॐ सर्वे सन्तु निरामयाः – सभी रोगमुक्त रहें।
     

  5. ॐ सर्वे भद्राणि पश्यन्तु – सभी शुभ देखें।
     

  6. ॐ सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् – शुभ और सुख।
     

  7. ॐ ह्रीं सर्वसंतापशमनाय – मानसिक और आध्यात्मिक शांति।
     

  8. ॐ सर्वात्मने नमः – आत्मा में निहित ईश्वर को प्रणाम।
     

  9. ॐ नमः शिवाय – शिव भगवान को प्रणाम।
     

  10. ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्, ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः – समग्र मंगल और शांति का सर्वोच्च मंत्र।
     

नमो नमः

एक भारत, नेक भारत, अनेक परंपराएं

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